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Monday, January 2, 2012

संसद और लोकपाल

नया साल नई उम्मीदें लेकर आया है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने
भी उत्साहजनक आश्वासन दिए हैं। लेकिन
बीते साल के अंत में देश ने लोकपाल
का जो हश्र देखा, उसके बाद बहुत
उत्साहित होने की गुंजाइश क्या सचमुच
है? पिछले दिनों लोकपाल पर गतिरोध
को सरकार की हार के रूप में देखा गया,
लेकिन उस दिन हमारा संसदीय लोकतंत्र
पराजित हुआ। उसकी पूर्व
भूमिका अन्ना आंदोलन ने मानो एक दिन
पहले ही बना ली थी, जब मुंबई में वह मन से
कमजोर पड़ा था और उपवास और आंदोलन
का सारा कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर
वापस रालेगण सिद्धि लौट गया था।
लोकसभा और राज्यसभा की तीन
दिनों की आपात बैठक में जो हुआ और जिस
तरह हुआ, उससे एक बात एकदम साफ हो गई
कि सत्ता-वर्ग को लोकपाल
की व्यवस्था स्वीकार नहीं है। सभी कहते
रहे कि वे एक मजबूत लोकपाल चाहते हैं, और
सभी बताते रहे कि मजबूत लोकपाल वह
होगा, जिसमें उनकी गरदन न फंसे। टीम
अन्ना की तरफ से जन लोकपाल
का जो खाका जनता व सरकार के सामने
रखा गया था, दोनों सदनों में किसी ने
गलती से भी उसका जिक्र नहीं किया।
जहां से यह परिकल्पना आई थी और जिसके
जन-समर्थन के आगे सत्ता वर्ग को मजबूर
होकर झुकना पड़ा था, उसका नाम लेने से
सभी बचते रहे, सत्ता व विपक्ष में
ऐसी एका की तरफ हमारा ध्यान
गया या नहीं?
सभी जानते हैं कि जन लोकपाल
की अवधारणा ऐसी है कि उसका कोई
भी संस्करण आप तैयार करेंगे, वह
आपकी मनमानी पर लगाम लगाएगा।
जबकि आजादी के बाद के 65 वर्षों तक
सत्ता वर्ग ऐसी मनोभूमिका में जिया है
कि उसे मनमानी अपना जन्मसिद्ध
अधिकार लगने लगी है। इसीलिए आप जन
लोकपाल लाइए या ‘राइट टु रिजेक्ट’
का विकल्प रखने की बात कीजिए,
आपको कभी कोई उत्साहप्रद प्रत्युत्तर
नहीं मिलेगा।
प्रतिनिधि वापसी का अधिकार
जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के
आंदोलन की मुख्य मांगों में एक था। उसके
लिए समर्थन जुटाने के हस्ताक्षर अभियान
के परिपत्र पर
पहला हस्ताक्षरजयप्रकाश नारायण ने
किया था।
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से जब हमने
उस परिपत्र पर हस्ताक्षर करने
का आग्रह किया, तो वह उसे परे हटाते हुए
बोले, हमारे डेथ वारंट पर
हमारा ही हस्ताक्षर चाहते हैं आप! यह है
सत्ता-वर्ग का मानस, जो अपने लिए
पूरा लोकतंत्र चाहता है, लेकिन
बाकी सारे देश के लिए लोकतंत्र
की परिकल्पना उसकी कृपा से छूटा हुआ
जूठन भर है।
कांग्रेसी लोकपाल में
जो व्यवस्था सोची गई है, वह अत्यंत
जटिल है, ऐसा कहना सच नहीं है। सचाई
यह है कि वह राजनीतिक व्यवस्था के तौर
पर कहीं से भी ईमानदार नहीं है। विपक्ष
ने दोनों सदनों में इस पर जैसे आक्रमण किए,
उससे न सिर्फ यह साबित हुआ कि वह
सत्ता-पक्ष को परेशानी में डालकर
उसका राजनीतिक
फायदा उठाना चाहता है, बल्कि यह
भी साबित हुआ कि वह लोकपाल
नहीं चाहता, किसी भी तरह के लोकपाल
की व्यवस्था में उसकी और कपिल सिब्बल
की आस्था में कोई फर्क नहीं है। इसलिए
कपिल सिब्बल ने लोकसभा में और अभिषेक
मनु सिंघवी ने राज्यसभा में सरकारी पक्ष
को जिस तरह सामने रखा, उसमें मुग्ध कर
देने वाली कानूनी दक्षता थी, संविधान
की बारीकियों का खुलासा था और
विपक्ष को खोखला बताने वाले विष बुझे
तीर थे, नहीं थी, तो केवल आने वाले
दिनों में विकसित होते लोकतंत्र के
प्रति कोई आस्था।
विपक्ष की बागडोर अरुण जेटली और
सुषमा स्वराज के हाथों में थी।
दोनों भाषा के धनी और संसद को हथियार
के तौर पर बरतने में पटु हैं। लोकपाल और
अन्ना की आड़ में सुषमा स्वराज खुले तौर
पर भाजपा की राजनीति को आगे बढ़ाने में
लगी थीं, इसीलिए सबसे ज्यादा भद
भी उनकी ही पिटी। अरुण जेटली ने
सावधानी बरती और विपक्ष को साथ लेने
की भरपूर कोशिश की।
उनकी ही रणनीति का नतीजा था कि सपा,
बसपा और तृणमूल को लोकसभा से एकदम
अलग रुख लेने पर मजबूर होना पड़ा।
सरकार इसे पहचान रही थी और इसीलिए
उसने मतदान से कन्नी काट ली।
लोकसभा के सबसे बुजुर्ग और जहीन सदस्य
प्रणब मुखर्जी ने उस दिन जितना और
जो कुछ कहा, उसमें उनकी उलझन साफ
दिखाई दे रही थी, क्योंकि उन्हें
जिंदा मछली निगलनी पड़ रही थी। वह
प्रणब मुखर्जी ही थे, जिन्होंने
रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के पिछले
उपवास के अंत में सेंस ऑफ हाउस
का रास्ता निकाला था और उस पर
भरोसा करके अन्ना हजारे ने
अपना उपवास तोड़ा था। अब उसी सेंस ऑफ
द हाउस की मिट्टी पलीद कर
जो लोकपाल सामने लाया गया, उसके छद्म
को पीना प्रणब मुखर्जी को भी भारी पड़
रहा था। वह उस दिन लोकसभा में भीष्म
की भूमिका में थे; जब भी लोकपाल
का इतिहास लिखा जाएगा, वह इसी रूप
में याद किए जाएंगे।
अब आगे क्या? राज्यसभा में इस लोकपाल
का शव पड़ा है, सरकारी वेताल इसे फिर से
जल्दी ही कंधे पर उठाएगा, इसकी कोई
संभावना नहीं लगती। पांच राज्यों में
होने वाले चुनावों में टीम अन्ना इसे
मुद्दा बनाने की सोच रही है। लेकिन
चुनाव के गड्ढे में आंदोलन को उतारने
की गलती ऐसी भी हो सकती है, जिसमें से
एक नई पराजय सामने आए। टीम
अन्ना को यह
तो बताना ही होगा कि इस बहस के बाद
हमारी राजनीति का जो चेहरा सामने
आया है, क्या उसके बाद भी सिर्फ कांग्रेस
को वोट न देने का कोई औचित्य होगा?

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