जब भविष्य में कभी इतिहासकार 2011
का विश्लेषण करने बैठेंगे, तो एक शब्द
उनकी आंखों के सामने बड़े-बड़े अक्षरों में
चमकेगा और वह है-भ्रष्टाचार। पूरे वर्ष
की पहचान इस शब्द से है। आंदोलन हुए
भ्रष्टाचार के खिलाफ, सुर्खियों में
रहा भ्रष्टाचार मुद्दा और भारत के
शहरों में बरसों बाद ऐसे लोग प्रदर्शन
करने निकले, जो अकसर राजनीति से दूर
रहना पसंद करते हैं। यह सब होने के बाद
समझ में नहीं आता कि हम क्यों नहीं पहुंच
पाए हैं राजनीतिक भ्रष्टाचार के
असली कारण तक। न अन्ना हजारे और
उनकी टीम गई है वहां तक और न हम
पत्रकार।
भ्रष्टाचार पर रोज बहस छिड़ती है
किसी न किसी टीवी चैनल पर। इस
सारी बहस में क्यों नहीं हम सुनते हैं
परिवारवाद का जिक्र, जो मेरी राय में
भ्रष्टाचार की असली जड़ है।
क्यों नहीं हम स्वीकार करने को तैयार हैं
कि जब तक संसद एक निजी क्लब
बनी रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार के कम
होने का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए
कि जब कोई राजनेता अपने परिवार के
किसी सदस्य को सौंपता है अपना चुनाव
क्षेत्र, तो वह उसे खानदानी जायदाद
समझ कर ही सौंपता है। यह परंपरा शुरू
की थी इंदिरा गांधी ने, जब उन्होंने
इमरजेंसी के दौरान अपने छोटे पुत्र संजय
को देश चलाने का अधिकार दिया था।
गैरसांविधानिक था उनका ऐसा करना।
सो, 1977 में संजय गांधी अमेठी से चुनाव
लड़ने को मजबूर हुए। हारे उस बार
बुरी तरह, लेकिन 1980 में जीत के
लोकसभा में आए और कांग्रेस ने
उनको स्वीकार किया युवराज के रूप में।
देश ने ऐतराज नहीं किया, न तब, न उस
समय, जब संजय की मृत्यु के बाद राजीव बने
इंदिरा जी के उत्तराधिकारी। यहां से
शुरू होती है जनतांत्रिक समाजवाद
की राजनीति, जो इस देश के मतदाताओं ने
इतने प्यार से स्वीकार की है, कि राजीव
जी के बाद जरा भी विरोध नहीं हुआ, जब
उनकी पत्नी ने उनकी जगह ली। न
ही हमको ऐतराज है कि सोनिया जी के
पुत्र अब उनके उत्तराधिकारी हैं।
अन्य दलों ने जब देखा कि परिवारवाद
को देश के मतदाता पसंद करते हैं, तो यह
परंपरा उन्होंने भी अपनाई। आज
स्थिति यह है कि देश के तकरीबन सारे
राजनीतिक दल खानदानी जायदाद बन
गए हैं किसी न किसी राजनीतिक
परिवार के। संसद का तो यह हाल है
कि तकरीबन सारे नौजवान सांसद
किसी न किसी राजनीतिक परिवार के
सदस्य हैं और संसद एक प्राइवेट क्लब
बनती रही है।
जनता की सेवा को बहाना बनाकर
राजनीति अब बिजनेस बन गई है। सुबूत है
यह यथार्थ कि राजनीति में आते ही लोग
इतने अमीर हो जाते हैं अचानक। अगर आप
कुछ महिला सांसदों के लिबास, जूते और
पर्स का ही हिसाब लगाएं, तो हैरान रह
जाएंगे। मैं दावे के साथ कह सकती हूं
कि पर्स और जूते ही इन देवियों के
लाखों रुपये के होते हैं। ऐसी महिलाएं
करेंगी जनता की सेवा?
राजनीति पर लिखने की वजह से कई बार
मौका मिला है मुझे आला राजनीतिकों के
सरकारी निवासों को अंदर से देखने का।
कहना जरूरी है कि इस गरीब देश के
राजनेताओं का रहन-सहन
किसी अति अमीर उद्योगपति से कम
नहीं है। इतना मुनाफा है राजनीति में आने
का कि छोटे-मोटे ग्रामीण राजनीतिक
भी कुरसी छोड़ेते हैं तभी, जब उसे अपने
परिवार के किसी सदस्य के हवाले कर सकें
तभी।
अन्य लोकतांत्रिक देशों में
ऐसा नहीं होता है। अन्य लोकतांत्रिक
देशों में संसद में वही लोग पहुंचते हैं,
जो साबित कर सकते हैं जनता के दरबार में
कि वे उनकी सेवा के लिए सार्वजनिक
जीवन में कदम रख रहे हैं। अमेरिका में
तो कड़ी पाबंदी है राष्ट्रपति पद पर
किसी एक व्यक्ति के तीसरी बार आने पर।
और हम हैं कि पिछले 64 वर्षों से एक
ही परिवार को देश की बागडोर सौंपते
आए हैं बोफोर्स जैसे कांड के बावजूद।
बोफोर्स में रिश्वत
का पैसा पाया गया गांधी परिवार के
करीबी दोस्त ओटावियो क्वात्रोची के
बैंक खाते में।
उसको देश से भागने दिया आधी रात
को एक कांग्रेस सरकार ने और ऐसा होने के
बावजूद हमने प्यार से देश
को किया सोनिया जी के हवाले। ऊपर से
करते हैं हम बड़ी-बड़ी बातें भ्रष्टाचार
को हटाने की। वास्तव में अगर
भ्रष्टाचार को हम करना चाहते हैं,
तो जरूरत सशक्त लोकपाल की नहीं है,
जरूरत है लोकतांत्रिक समाजवाद की जड़ें
उखाड़ने की। यह काम लोकपाल नहीं कर
सकता। यह काम कर सकते हैं सिर्फ देश के
मतदाता। जिस दिन अपना मत
राजनीतिक
उत्तराधिकारियों को देना बंद करेंगे
मतदाता, उस दिन से नींव
रखी जाएगी एक नई, आधुनिक
राजनीति की, क्योंकि तब आएंगे
राजनीति में वे लोग, जो वास्तव में देश
की सेवा करना चाहते हैं।
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Monday, December 26, 2011
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