जब भविष्य में कभी इतिहासकार 2011
का विश्लेषण करने बैठेंगे, तो एक शब्द
उनकी आंखों के सामने बड़े-बड़े अक्षरों में
चमकेगा और वह है-भ्रष्टाचार। पूरे वर्ष
की पहचान इस शब्द से है। आंदोलन हुए
भ्रष्टाचार के खिलाफ, सुर्खियों में
रहा भ्रष्टाचार मुद्दा और भारत के
शहरों में बरसों बाद ऐसे लोग प्रदर्शन
करने निकले, जो अकसर राजनीति से दूर
रहना पसंद करते हैं। यह सब होने के बाद
समझ में नहीं आता कि हम क्यों नहीं पहुंच
पाए हैं राजनीतिक भ्रष्टाचार के
असली कारण तक। न अन्ना हजारे और
उनकी टीम गई है वहां तक और न हम
पत्रकार।
भ्रष्टाचार पर रोज बहस छिड़ती है
किसी न किसी टीवी चैनल पर। इस
सारी बहस में क्यों नहीं हम सुनते हैं
परिवारवाद का जिक्र, जो मेरी राय में
भ्रष्टाचार की असली जड़ है।
क्यों नहीं हम स्वीकार करने को तैयार हैं
कि जब तक संसद एक निजी क्लब
बनी रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार के कम
होने का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए
कि जब कोई राजनेता अपने परिवार के
किसी सदस्य को सौंपता है अपना चुनाव
क्षेत्र, तो वह उसे खानदानी जायदाद
समझ कर ही सौंपता है। यह परंपरा शुरू
की थी इंदिरा गांधी ने, जब उन्होंने
इमरजेंसी के दौरान अपने छोटे पुत्र संजय
को देश चलाने का अधिकार दिया था।
गैरसांविधानिक था उनका ऐसा करना।
सो, 1977 में संजय गांधी अमेठी से चुनाव
लड़ने को मजबूर हुए। हारे उस बार
बुरी तरह, लेकिन 1980 में जीत के
लोकसभा में आए और कांग्रेस ने
उनको स्वीकार किया युवराज के रूप में।
देश ने ऐतराज नहीं किया, न तब, न उस
समय, जब संजय की मृत्यु के बाद राजीव बने
इंदिरा जी के उत्तराधिकारी। यहां से
शुरू होती है जनतांत्रिक समाजवाद
की राजनीति, जो इस देश के मतदाताओं ने
इतने प्यार से स्वीकार की है, कि राजीव
जी के बाद जरा भी विरोध नहीं हुआ, जब
उनकी पत्नी ने उनकी जगह ली। न
ही हमको ऐतराज है कि सोनिया जी के
पुत्र अब उनके उत्तराधिकारी हैं।
अन्य दलों ने जब देखा कि परिवारवाद
को देश के मतदाता पसंद करते हैं, तो यह
परंपरा उन्होंने भी अपनाई। आज
स्थिति यह है कि देश के तकरीबन सारे
राजनीतिक दल खानदानी जायदाद बन
गए हैं किसी न किसी राजनीतिक
परिवार के। संसद का तो यह हाल है
कि तकरीबन सारे नौजवान सांसद
किसी न किसी राजनीतिक परिवार के
सदस्य हैं और संसद एक प्राइवेट क्लब
बनती रही है।
जनता की सेवा को बहाना बनाकर
राजनीति अब बिजनेस बन गई है। सुबूत है
यह यथार्थ कि राजनीति में आते ही लोग
इतने अमीर हो जाते हैं अचानक। अगर आप
कुछ महिला सांसदों के लिबास, जूते और
पर्स का ही हिसाब लगाएं, तो हैरान रह
जाएंगे। मैं दावे के साथ कह सकती हूं
कि पर्स और जूते ही इन देवियों के
लाखों रुपये के होते हैं। ऐसी महिलाएं
करेंगी जनता की सेवा?
राजनीति पर लिखने की वजह से कई बार
मौका मिला है मुझे आला राजनीतिकों के
सरकारी निवासों को अंदर से देखने का।
कहना जरूरी है कि इस गरीब देश के
राजनेताओं का रहन-सहन
किसी अति अमीर उद्योगपति से कम
नहीं है। इतना मुनाफा है राजनीति में आने
का कि छोटे-मोटे ग्रामीण राजनीतिक
भी कुरसी छोड़ेते हैं तभी, जब उसे अपने
परिवार के किसी सदस्य के हवाले कर सकें
तभी।
अन्य लोकतांत्रिक देशों में
ऐसा नहीं होता है। अन्य लोकतांत्रिक
देशों में संसद में वही लोग पहुंचते हैं,
जो साबित कर सकते हैं जनता के दरबार में
कि वे उनकी सेवा के लिए सार्वजनिक
जीवन में कदम रख रहे हैं। अमेरिका में
तो कड़ी पाबंदी है राष्ट्रपति पद पर
किसी एक व्यक्ति के तीसरी बार आने पर।
और हम हैं कि पिछले 64 वर्षों से एक
ही परिवार को देश की बागडोर सौंपते
आए हैं बोफोर्स जैसे कांड के बावजूद।
बोफोर्स में रिश्वत
का पैसा पाया गया गांधी परिवार के
करीबी दोस्त ओटावियो क्वात्रोची के
बैंक खाते में।
उसको देश से भागने दिया आधी रात
को एक कांग्रेस सरकार ने और ऐसा होने के
बावजूद हमने प्यार से देश
को किया सोनिया जी के हवाले। ऊपर से
करते हैं हम बड़ी-बड़ी बातें भ्रष्टाचार
को हटाने की। वास्तव में अगर
भ्रष्टाचार को हम करना चाहते हैं,
तो जरूरत सशक्त लोकपाल की नहीं है,
जरूरत है लोकतांत्रिक समाजवाद की जड़ें
उखाड़ने की। यह काम लोकपाल नहीं कर
सकता। यह काम कर सकते हैं सिर्फ देश के
मतदाता। जिस दिन अपना मत
राजनीतिक
उत्तराधिकारियों को देना बंद करेंगे
मतदाता, उस दिन से नींव
रखी जाएगी एक नई, आधुनिक
राजनीति की, क्योंकि तब आएंगे
राजनीति में वे लोग, जो वास्तव में देश
की सेवा करना चाहते हैं।
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Monday, December 26, 2011
स्त्रियों के पास विकल्प जैसा कुछ नहीं होता
ऋषि-मुनियों के लिए इंद्र के दरबार में
विशेष नृत्य का आयोजन था। नृत्य धीरे-
धीरे ऋषि-मुनियों के दिलो-दिमाग पर
हावी हो रहा था। किसी कोने से आवाज
आयी – आभूषण उतारो। अप्सरा ने नाचते-
नाचते आभूषण उतार दिये। कुछ देर बाद
दूसरे कोने से आवाज आयी – वस्त्र उतारो।
अप्सरा ने आदेश/आग्रह का पालन किया।
रात के तीसरे पहर किसी तंग गली के डांस
बार और सात-सितारा होटल के
डिस्कोथेक का माहौल देवलोक के उस कक्ष
में तारी था। उत्तेजक उन्माद में ऋषि-
मुनि दर्शन और अध्यात्म के अध्याय भूल चुके
थे या यों कहें कि इनमें हवस का भी एक
परिशिष्ट जोड़ रहे थे। अब आवाजें जल्दी-
जल्दी आने लगी थीं – और उतारो, और
उतारो, थोड़ा और… अब वह बिल्कुल नग्न
थी। उत्तेजना चरम पर थी।
सहोदराना ब्रह्मानंद का वातावरण
था। तभी आवाज आयी – यह चमड़े
का आवरण भी उतारो। अप्सरा ने
ऐसा ही किया (उसके पास और कोई
विकल्प भी न था)। स्त्रियों के पास
विकल्प जैसा कुछ
नहीं होता जबकि पूरा विश्व है पुरुष के
जीतने के लिए, पूरी वसुंधरा है उसे भोगने के
लिए। बस उसे कुछ बेड़ियां छोड़नी है और
थोड़ी वीरता दिखानी है।
हालांकि आजतक
नहीं जीता जा सका विश्व और न
ही भोगी गयी वसुंधरा। हर बार
जीती गयी स्त्री। हर बार उसे
ही भोगा गया।
विशेष नृत्य का आयोजन था। नृत्य धीरे-
धीरे ऋषि-मुनियों के दिलो-दिमाग पर
हावी हो रहा था। किसी कोने से आवाज
आयी – आभूषण उतारो। अप्सरा ने नाचते-
नाचते आभूषण उतार दिये। कुछ देर बाद
दूसरे कोने से आवाज आयी – वस्त्र उतारो।
अप्सरा ने आदेश/आग्रह का पालन किया।
रात के तीसरे पहर किसी तंग गली के डांस
बार और सात-सितारा होटल के
डिस्कोथेक का माहौल देवलोक के उस कक्ष
में तारी था। उत्तेजक उन्माद में ऋषि-
मुनि दर्शन और अध्यात्म के अध्याय भूल चुके
थे या यों कहें कि इनमें हवस का भी एक
परिशिष्ट जोड़ रहे थे। अब आवाजें जल्दी-
जल्दी आने लगी थीं – और उतारो, और
उतारो, थोड़ा और… अब वह बिल्कुल नग्न
थी। उत्तेजना चरम पर थी।
सहोदराना ब्रह्मानंद का वातावरण
था। तभी आवाज आयी – यह चमड़े
का आवरण भी उतारो। अप्सरा ने
ऐसा ही किया (उसके पास और कोई
विकल्प भी न था)। स्त्रियों के पास
विकल्प जैसा कुछ
नहीं होता जबकि पूरा विश्व है पुरुष के
जीतने के लिए, पूरी वसुंधरा है उसे भोगने के
लिए। बस उसे कुछ बेड़ियां छोड़नी है और
थोड़ी वीरता दिखानी है।
हालांकि आजतक
नहीं जीता जा सका विश्व और न
ही भोगी गयी वसुंधरा। हर बार
जीती गयी स्त्री। हर बार उसे
ही भोगा गया।
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षि-मुनियों के लिए इंद्र के दरबार में
विशेष नृत्य का आयोजन था। नृत्य धीरे-
धीरे ऋषि-मुनियों के दिलो-दिमाग पर
हावी हो रहा था। किसी कोने से आवाज
आयी – आभूषण उतारो। अप्सरा ने नाचते-
नाचते आभूषण उतार दिये। कुछ देर बाद
दूसरे कोने से आवाज आयी – वस्त्र उतारो।
अप्सरा ने आदेश/आग्रह का पालन किया।
रात के तीसरे पहर किसी तंग गली के डांस
बार और सात-सितारा होटल के
डिस्कोथेक का माहौल देवलोक के उस कक्ष
में तारी था। उत्तेजक उन्माद में ऋषि-
मुनि दर्शन और अध्यात्म के अध्याय भूल चुके
थे या यों कहें कि इनमें हवस का भी एक
परिशिष्ट जोड़ रहे थे। अब आवाजें जल्दी-
जल्दी आने लगी थीं – और उतारो, और
उतारो, थोड़ा और… अब वह बिल्कुल नग्न
थी। उत्तेजना चरम पर थी।
सहोदराना ब्रह्मानंद का वातावरण
था। तभी आवाज आयी – यह चमड़े
का आवरण भी उतारो। अप्सरा ने
ऐसा ही किया (उसके पास और कोई
विकल्प भी न था)। स्त्रियों के पास
विकल्प जैसा कुछ
नहीं होता जबकि पूरा विश्व है पुरुष के
जीतने के लिए, पूरी वसुंधरा है उसे भोगने के
लिए। बस उसे कुछ बेड़ियां छोड़नी है और
थोड़ी वीरता दिखानी है।
हालांकि आजतक
नहीं जीता जा सका विश्व और न
ही भोगी गयी वसुंधरा। हर बार
जीती गयी स्त्री। हर बार उसे
ही भोगा गया।
विशेष नृत्य का आयोजन था। नृत्य धीरे-
धीरे ऋषि-मुनियों के दिलो-दिमाग पर
हावी हो रहा था। किसी कोने से आवाज
आयी – आभूषण उतारो। अप्सरा ने नाचते-
नाचते आभूषण उतार दिये। कुछ देर बाद
दूसरे कोने से आवाज आयी – वस्त्र उतारो।
अप्सरा ने आदेश/आग्रह का पालन किया।
रात के तीसरे पहर किसी तंग गली के डांस
बार और सात-सितारा होटल के
डिस्कोथेक का माहौल देवलोक के उस कक्ष
में तारी था। उत्तेजक उन्माद में ऋषि-
मुनि दर्शन और अध्यात्म के अध्याय भूल चुके
थे या यों कहें कि इनमें हवस का भी एक
परिशिष्ट जोड़ रहे थे। अब आवाजें जल्दी-
जल्दी आने लगी थीं – और उतारो, और
उतारो, थोड़ा और… अब वह बिल्कुल नग्न
थी। उत्तेजना चरम पर थी।
सहोदराना ब्रह्मानंद का वातावरण
था। तभी आवाज आयी – यह चमड़े
का आवरण भी उतारो। अप्सरा ने
ऐसा ही किया (उसके पास और कोई
विकल्प भी न था)। स्त्रियों के पास
विकल्प जैसा कुछ
नहीं होता जबकि पूरा विश्व है पुरुष के
जीतने के लिए, पूरी वसुंधरा है उसे भोगने के
लिए। बस उसे कुछ बेड़ियां छोड़नी है और
थोड़ी वीरता दिखानी है।
हालांकि आजतक
नहीं जीता जा सका विश्व और न
ही भोगी गयी वसुंधरा। हर बार
जीती गयी स्त्री। हर बार उसे
ही भोगा गया।
Friday, December 23, 2011
मांगा था लोकपाल मिला मरा हुआ साँप
मित्रों,क्या आपके साथ कभी आपके किसी अपने ने विश्वासघात किया है?यक़ीनन किया है मियां.वर्तमान में देश को चलानेवाले नेता भी तो कोई गैर नहीं हैं,अपने ही हैं.धोखा देने की क्या गजब की क्षमता है इनकी?एक-एक मुँह में सैंकड़ों जुबान रखते हैं ये लोग.आज ६१-६२ सालों से ये लोग जनता को यह झूठा विश्वास दिलाने में लगे हैं कि देश में लोकतंत्र है.ऐसा लोकतंत्र जिसमें लोक की नहीं चलती,उनकी बिलकुल भी नहीं सुनी जाती बल्कि यह लोकतंत्र तो ऐसा लोकतंत्र है जैसा कि नेता चाहते हैं.यह नेताओं का,नेताओं के लिए और नेताओं के द्वारा लोकतंत्र है.हम चुनाव-दर-चुनाव धोखा खा रहे हैं.हम वास्तव में चुनावों में अपना प्रतिनिधि नहीं चुनते हैं बल्कि हालत तो ऐसी हो गयी हैं कि मानो हम बकरियां हैं और प्रत्येक चुनाव में हम अपने ही हाथों अपने कसाई का चुनाव करते हैं:-वो बेदर्दी से सर काटे ‘आमिर’ और मैं कहूं उनसे,हुजुर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता.
मित्रों,अब हम लोकपाल के मुद्दे को ही लें जिसके चलते इस जिस्म में बहते खून को भी जमा देनेवाली सर्दी में भी केंद्र सरकार को पसीने आ रहे हैं.सरकार ने अप्रैल में बिल ड्राफ्टिंग कमिटी बनाई और अंत में अपनी मर्जी का बकवास बिल बनाकर संसद के आगे रख दिया.फिर वह बिल विचारार्थ स्टैंडिंग कमिटी में गयी और अब जब अंतिम रूप में पेश की गयी हैं तब पता चला है कि यह तो खोदा पहाड़ और निकली चुहिया भी नहीं बल्कि मरा हुआ साँप निकला;वो भी विषहीन और दंतहीन.देश ने माँगा था एक ऐसा हथियार जिसे हाथ में लेकर देशवासी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकें लेकिन थमाया तो झुनझुना थमा दिया.बस बजाते रहिए और छोटे बच्चे की तरह खुश होते रहिए.बिल बनाने वाली स्टैंडिंग कमिटी में लोग भी कैसे-कैसे थे किसी से छुपा हुआ नहीं है.इनमें से कोई है घोटाला विशेषज्ञ तो कोई जातिवादी राजनीति का प्रणेता है.
मित्रों,यह कैसा लोकपाल है जो न तो किसी भ्रष्टाचारी के विरुद्ध स्वतः कोई कदम ही उठा सकता है और न तो खुद जाँच ही कर सकता है.फिर क्या करेगा देश ऐसा पोस्टमास्टरनुमा लोकपाल लेकर?अगर ५५ हजार लोग चाहिए ५५ लाख कर्मचारियों पर नजर रखने के लिए तो बहाल करिए.किसने रोका है आपको बहाल करने से?आप ५५ लाख लोगों को तो देश को लूटने के लिए बहाल कर सकते हैं लेकिन उस लूट को रोकने के लिए ५५ हजार को नहीं बहाल कर सकते?क्या सरकार यह बताएगी कि दो-ढाई सौ सीवीसी कर्मी भला कैसे इन ५५ लाख कर्मचारियों पर नियंत्रण रखेंगे?साथ ही इस बिल में यह प्रावधान भी कर दिया गया है कि भ्रष्टाचार में आरोपित लोगों को सरकार मुफ्त में २ सालों तक कानूनी सहायता देगी.क्या इस तरह मिटेगा भ्रष्टाचार?साथ ही निजी कंपनियों को भी इसमें कई प्रकार की राहत दे दी गयी है.क्या इस तरह से कम होगा भ्रष्टाचार?इस बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्यों में लोकायुक्त राज्य पुलिस से मामलों की जाँच करवाएगा.जो प्रदेश पुलिस खुद ही भ्रष्टाचार का अड्डा है वो भला कैसे भ्रष्टाचार मिटाने में कैसे सहायक हो सकती है?क्या इस तरह से मिटेगा भ्रष्टाचार?बिल में लोकपाल में कम-से-कम ५०% से अधिक आरक्षण का प्रावधान किया गया है.इस तरह तो ९ में से कम-से-कम ५ पद आरक्षित हो जाएँगे.क्या यह उच्चतम न्यायालय के आरक्षण सम्बन्धी निर्णय के विपरीत नहीं है?साथ ही इसमें संविधान का घोर उल्लंघन करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण दे दिया गया है.ऐसे में अगर इस बिल को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया तब लोकपाल सम्बन्धी इस पूरी जद्दोजहद का और इस बिल का क्या होगा?
मित्रों,राजमाता,त्यागमूर्ति सोनिया जी का कहना है कि उन्होंने जो लोकपाल दिया है वह बहुत सशक्त है;वाकई बहुत सशक्त है.उसको एक कार्यालय चलाने का अधिकार दिया गया है जिसमें काम करनेवाले चपरासियों पर उसका ही रोबदाब चलेगा.चाहे जितना पानी पीए,उन्हें बाजार भेजकर चाहे जितना खाना मंगवाए और जब जी चाहे लघुशंका और दीर्घशंका से भी हो आवे.हाँ,वो अपनी मर्जी से किसी भी भ्रष्टाचारी के विरूद्ध न तो कोई जाँच ही कर सकता है और न ही जाँच शुरू करवा सकता है.बहुत ज्यादा अधिकार दे दिया है इन्होंने लोकपाल को;इतनी अधिक मनमानी करने की अनुमति तो इन्होंने प्रधानमंत्री को भी नहीं दी है;अब और कितना अधिकार चाहिए?सही तो कहा है इन्होंने,वो बेचारा अर्थशास्त्री तो इनसे पूछे बिना पाखाना-पेशाब करने भी नहीं जा पाता है.
मित्रों,जहाँ तक लोकपाल की नियुक्ति का प्रश्न है तो सोनिया-राहुल जी भला कैसे नियुक्ति समिति में सरकारी बहुमत नहीं रहने दें?कल को अगर कोई अपने पालतू की जगह दूसरा आदमी लोकपाल बन जाता है तो फिर उन्हीं को भीतर कर देगा.आखिर ये लोग भी इन्सान हैं,नेता हैं;इनके हाथों से भी सजा होने लायक गबन-घोटाला हो सकता है और क्या पता कि हो भी चुका हो.ऐसे में ये लोग भला कैसे जेल जाने का जोखिम ले सकते हैं?भला कैसे ये लोग अपने ही गले की नाप का फंदा बना कर अपनी ही गर्दनों में उनके भीतर डाल दें?इसलिए तो लोकपाल को निलंबित करने या हटाने का अधिकार भी इनलोगों ने अपने ही सुरक्षित हाथों में रखा है.
मित्रों,इन विश्वासघातियों ने देश को लूटने में पहले से ही आरक्षण दे रखा है और अब इसे रोकनेवाली संस्था में भी आरक्षण दिया जा रहा है जिससे कि उनकी जाति-धर्म के लोगों द्वारा की जानेवाली लूट में बाधा न आने पाए.अब आगे लोकपाल के मुद्दे का और मुद्दे पर क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता.इस मामले में देश फिर से अप्रैल २०१० में आकर खड़ा हो गया है.अन्ना अनशन तो जरुर करेंगे,शायद सरकार फिर से झुकती हुई नजर भी आएगी और फिर से देश से कोई वादा भी कर देगी लेकिन पूरी हरगिज नहीं करेगी.जनता जिसे लोकतंत्र में वास्तविक मालिक कहा जाता है भविष्य में सशक्त लोकपाल की मांग का भविष्य भी उसी के रूख पर निर्भर करेगा.शायद जनता रूपी कुत्ते के आगे अगले कुछ ही दिनों में खाद्य सुरक्षा गारंटी और अल्पसंख्यक आरक्षण के नाम की रोटी फेंक दी जाएगी और शायद उसके लालच में आकर आकर जनता एक बार फिर कांग्रेस को वोट दे देगी.आपको अपनी बेबकूफी पर कितना यकीन है यह तो आप ही बेहतर जानते होंगे लेकिन सोनिया-राहुल को तो आपकी मूर्खता पर अटूट विश्वास है.तभी तो वे लोकपाल के मामले में अपनी मक्कारी पर इतराते हुए दंभ भर रहे हैं कि पिछले सवा सौ सालों में (इसे अगर संशोधित कर पिछले ६४ सालों में कहा जाए और आजादी के बाद के वर्षों की ही गणना की जाए तो बेहतर होगा) तेरे जैसे लाखों आए,लाखों ने हमको आँख दिखाए,
रहा न नामोनिशान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान.
मित्रों,अब हम लोकपाल के मुद्दे को ही लें जिसके चलते इस जिस्म में बहते खून को भी जमा देनेवाली सर्दी में भी केंद्र सरकार को पसीने आ रहे हैं.सरकार ने अप्रैल में बिल ड्राफ्टिंग कमिटी बनाई और अंत में अपनी मर्जी का बकवास बिल बनाकर संसद के आगे रख दिया.फिर वह बिल विचारार्थ स्टैंडिंग कमिटी में गयी और अब जब अंतिम रूप में पेश की गयी हैं तब पता चला है कि यह तो खोदा पहाड़ और निकली चुहिया भी नहीं बल्कि मरा हुआ साँप निकला;वो भी विषहीन और दंतहीन.देश ने माँगा था एक ऐसा हथियार जिसे हाथ में लेकर देशवासी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकें लेकिन थमाया तो झुनझुना थमा दिया.बस बजाते रहिए और छोटे बच्चे की तरह खुश होते रहिए.बिल बनाने वाली स्टैंडिंग कमिटी में लोग भी कैसे-कैसे थे किसी से छुपा हुआ नहीं है.इनमें से कोई है घोटाला विशेषज्ञ तो कोई जातिवादी राजनीति का प्रणेता है.
मित्रों,यह कैसा लोकपाल है जो न तो किसी भ्रष्टाचारी के विरुद्ध स्वतः कोई कदम ही उठा सकता है और न तो खुद जाँच ही कर सकता है.फिर क्या करेगा देश ऐसा पोस्टमास्टरनुमा लोकपाल लेकर?अगर ५५ हजार लोग चाहिए ५५ लाख कर्मचारियों पर नजर रखने के लिए तो बहाल करिए.किसने रोका है आपको बहाल करने से?आप ५५ लाख लोगों को तो देश को लूटने के लिए बहाल कर सकते हैं लेकिन उस लूट को रोकने के लिए ५५ हजार को नहीं बहाल कर सकते?क्या सरकार यह बताएगी कि दो-ढाई सौ सीवीसी कर्मी भला कैसे इन ५५ लाख कर्मचारियों पर नियंत्रण रखेंगे?साथ ही इस बिल में यह प्रावधान भी कर दिया गया है कि भ्रष्टाचार में आरोपित लोगों को सरकार मुफ्त में २ सालों तक कानूनी सहायता देगी.क्या इस तरह मिटेगा भ्रष्टाचार?साथ ही निजी कंपनियों को भी इसमें कई प्रकार की राहत दे दी गयी है.क्या इस तरह से कम होगा भ्रष्टाचार?इस बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्यों में लोकायुक्त राज्य पुलिस से मामलों की जाँच करवाएगा.जो प्रदेश पुलिस खुद ही भ्रष्टाचार का अड्डा है वो भला कैसे भ्रष्टाचार मिटाने में कैसे सहायक हो सकती है?क्या इस तरह से मिटेगा भ्रष्टाचार?बिल में लोकपाल में कम-से-कम ५०% से अधिक आरक्षण का प्रावधान किया गया है.इस तरह तो ९ में से कम-से-कम ५ पद आरक्षित हो जाएँगे.क्या यह उच्चतम न्यायालय के आरक्षण सम्बन्धी निर्णय के विपरीत नहीं है?साथ ही इसमें संविधान का घोर उल्लंघन करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण दे दिया गया है.ऐसे में अगर इस बिल को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया तब लोकपाल सम्बन्धी इस पूरी जद्दोजहद का और इस बिल का क्या होगा?
मित्रों,राजमाता,त्यागमूर्ति सोनिया जी का कहना है कि उन्होंने जो लोकपाल दिया है वह बहुत सशक्त है;वाकई बहुत सशक्त है.उसको एक कार्यालय चलाने का अधिकार दिया गया है जिसमें काम करनेवाले चपरासियों पर उसका ही रोबदाब चलेगा.चाहे जितना पानी पीए,उन्हें बाजार भेजकर चाहे जितना खाना मंगवाए और जब जी चाहे लघुशंका और दीर्घशंका से भी हो आवे.हाँ,वो अपनी मर्जी से किसी भी भ्रष्टाचारी के विरूद्ध न तो कोई जाँच ही कर सकता है और न ही जाँच शुरू करवा सकता है.बहुत ज्यादा अधिकार दे दिया है इन्होंने लोकपाल को;इतनी अधिक मनमानी करने की अनुमति तो इन्होंने प्रधानमंत्री को भी नहीं दी है;अब और कितना अधिकार चाहिए?सही तो कहा है इन्होंने,वो बेचारा अर्थशास्त्री तो इनसे पूछे बिना पाखाना-पेशाब करने भी नहीं जा पाता है.
मित्रों,जहाँ तक लोकपाल की नियुक्ति का प्रश्न है तो सोनिया-राहुल जी भला कैसे नियुक्ति समिति में सरकारी बहुमत नहीं रहने दें?कल को अगर कोई अपने पालतू की जगह दूसरा आदमी लोकपाल बन जाता है तो फिर उन्हीं को भीतर कर देगा.आखिर ये लोग भी इन्सान हैं,नेता हैं;इनके हाथों से भी सजा होने लायक गबन-घोटाला हो सकता है और क्या पता कि हो भी चुका हो.ऐसे में ये लोग भला कैसे जेल जाने का जोखिम ले सकते हैं?भला कैसे ये लोग अपने ही गले की नाप का फंदा बना कर अपनी ही गर्दनों में उनके भीतर डाल दें?इसलिए तो लोकपाल को निलंबित करने या हटाने का अधिकार भी इनलोगों ने अपने ही सुरक्षित हाथों में रखा है.
मित्रों,इन विश्वासघातियों ने देश को लूटने में पहले से ही आरक्षण दे रखा है और अब इसे रोकनेवाली संस्था में भी आरक्षण दिया जा रहा है जिससे कि उनकी जाति-धर्म के लोगों द्वारा की जानेवाली लूट में बाधा न आने पाए.अब आगे लोकपाल के मुद्दे का और मुद्दे पर क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता.इस मामले में देश फिर से अप्रैल २०१० में आकर खड़ा हो गया है.अन्ना अनशन तो जरुर करेंगे,शायद सरकार फिर से झुकती हुई नजर भी आएगी और फिर से देश से कोई वादा भी कर देगी लेकिन पूरी हरगिज नहीं करेगी.जनता जिसे लोकतंत्र में वास्तविक मालिक कहा जाता है भविष्य में सशक्त लोकपाल की मांग का भविष्य भी उसी के रूख पर निर्भर करेगा.शायद जनता रूपी कुत्ते के आगे अगले कुछ ही दिनों में खाद्य सुरक्षा गारंटी और अल्पसंख्यक आरक्षण के नाम की रोटी फेंक दी जाएगी और शायद उसके लालच में आकर आकर जनता एक बार फिर कांग्रेस को वोट दे देगी.आपको अपनी बेबकूफी पर कितना यकीन है यह तो आप ही बेहतर जानते होंगे लेकिन सोनिया-राहुल को तो आपकी मूर्खता पर अटूट विश्वास है.तभी तो वे लोकपाल के मामले में अपनी मक्कारी पर इतराते हुए दंभ भर रहे हैं कि पिछले सवा सौ सालों में (इसे अगर संशोधित कर पिछले ६४ सालों में कहा जाए और आजादी के बाद के वर्षों की ही गणना की जाए तो बेहतर होगा) तेरे जैसे लाखों आए,लाखों ने हमको आँख दिखाए,
रहा न नामोनिशान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान.
Saturday, December 17, 2011
राजस्थान प्रश्नोत्तरी
1. मीरा-महोत्सव का आयोजन किस जिले में किया जाता है ?
उदयपुर में
✓ चित्तौड़गढ़ में
बांसवाड़ा में
कोटा में
मीरा-महोत्सव मीरा स्मृति संस्थान, चित्तौड़गढ द्वारा मीरा बाई के जन्म दिवस पर प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा से तीन दिवस के लिए मनाया जाता है।
2. जयपुर की इमारतों पर गुलाबी रंग करवाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है -
सवाई मानसिंह
कल्याण सिंह
✓ सवाई रामसिंह द्वितीय
मिर्जा राजा जयसिंह
1853 में जब वेल्स के राजकुमार आए तो महाराजा रामसिंह के आदेश से पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंग जादुई आकर्षण प्रदान करने की कोशिश की गई थी। उसी के बाद से यह शहर 'गुलाबी नगरी' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुंदर भवनों के आकर्षक स्थापत्य वाले, दो सौ वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जयपुर में जलमहल, जंतर-मंतर, आमेर महल, नाहरगढ़ का किला, हवामहल और आमेर का किला राजपूतों के वास्तुशिल्प के बेजोड़ नमूने हैं।
3. विश्व की सबसे बड़ी तोप किस किले में स्थित है ?
चित्तौड़गढ़ दुर्ग
मेहरानगढ़ दुर्ग
✓ जयगढ़ दुर्ग
नाहरगढ़ दुर्ग
जयपुर के जयगढ़ स्थित किले पर पहियों पर रखी जयबाण तोप विश्व की सबसे बड़ी तोप के रूप में प्रसिद्ध है।
4. गालव ऋषि का आश्रम जो वर्तमान में "मंकी वैली" के उपनाम से प्रसिद्ध है -
पंचकुर
✓ गलता
पुष्कर
चावंड
ऋषि गालव की पवित्र तपोभूमि गलता जयपुर स्थित एक प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है।
5. रमकडा उद्योग (सोप स्टोन के तराशे हुए खिलौने) किस जिले के प्रसिद्ध हैं ?
बीकानेर
हनुमानगढ़
✓ डूंगरपुर
नागौर
डूंगरपुर ग्रीन मार्बल एवं सोप स्टोन के वैश्विक निर्यात हेतु प्रसिद्ध है।
6. हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, उदयपुर के जिंक स्मेल्टर राजस्थान में कहां स्थित हैं ?
चंदेरिया, अकोला, देबारी
देबारी, अकोला
✓ देबारी, चंदेरिया
चंदेरिया, अकोला
7. किस झील पर शाहजहां द्वारा 1627 ई. में बारहदरियों का निर्माण किया गया ?
फतेहसागर झील
✓ आना सागर झील
कोलायत झील
सांभर झील
सम्राट शाहजहाँ ने सन् 1627 में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता 'राजा अरणो रा आनाजी' द्वारा 1135 से 1150 के बीच निर्मित आनासागर झील, अजमेर में लगभग 1240 फीट लम्बा कटहरा लगवाकर और बेहतरीन संगमरमर की पांच बारहदारियाँ बनवाई थी। साथ ही यहाँ शाहजहाँ ने झील की पाल पर संगमरमर की सुंदर बारहदरी का निर्माण करवाया था।
8. राजस्थान के प्रथम वित्त मंत्री कौन थे ?
जमनालाल बजाज
✓ चंदनमल बैद
हीरालाल शास्त्री
टीकाराम पालीवाल
9. देव सोमनाथ मेला किस जिले में भरता है ?
भीलवाड़ा
हनुमानगढ़
✓ डूंगरपुर
श्रीगंगानगर
देव सोमनाथ डूंगरपुर से 24 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित है। देव सोमनाथ सोम नदी के किनार बना एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर के बार में माना जाता है कि इसका निर्माण विक्रम संवत 12 शताब्दी के आसपास हुआ था।
10. राजस्थान में दरियां बनाने का काम किस स्थान पर विशेष रूप से किया जाता है ?
लेटा [जालोर]
तनसुख [जोधपुर]
खंडेला [सीकर]
✓ टांकला [नागौर]
नागौर के टांकला की दरियां, यहां के हस्त औजार, मकराना मार्बल उत्पाद ने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई है।
11. मारवाड़ का लघु माउंट कौन-सा स्थान कहलाता है ?
डीडवाना [नागौर]
रणथम्भौर [स. माधोपुर]
फतेहपुर शेखावाटी [सीकर]
✓ पीपलूट [बाड़मेर]
12. भारत का सर्वाधिक ऊन उत्पादक राज्य है -
गुजरात
उत्तरप्रदे
✓ राजस्थान
मध्यप्रदेश
देश के कुल ऊन उत्पादन में सर्वाधिक 40 प्रतिशत योगदान राजस्थान का है। एशिया की सबसे बडी ऊन की मण्डी बीकानरे में स्थित है।
13. राजस्थान राज्य अभिलेखागार कहां स्थित है ?
जयपुर
✓ बीकानेर
उदयपुर
जोधपुर
बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार देश के सबसे अच्छे और विश्व के चर्चित अभिलेखागारों में से एक है. इस अभिलेखागार की स्थापना 1955 में हुई और यह अपनी अपार व अमूल्य अभिलेख निधि के लिए प्रतिष्ठित है।
14. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान कहां स्थित है ?
✓ जोधपुर
दौसा
अजमेर
सीकर
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की स्थापना जोधपुर में सन् 1950 में की गई थी।
15. अमेरिकन कपास राजस्थान के किस जिले में होती है ?
✓ श्रीगंगानगर
सीकर
दौसा
भरतपुर
राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में अमेरिकन कपास प्राप्त की जाती है।
16. राज्य में तहसीलों की सर्वाधिक संख्या किस जिले में है ?
जोधपुर
उदयपुर
✓ जयपुर
गंगानगर
17. राजस्थान में रॉक फॉस्फेट कहां पाया जाता है ?
✓ उदयपुर
बांसवाड़ा
भीलवाड़ा
रामपुरा
18. राजस्थान का खेल नृत्य है -
झूमर
झूमरा
✓ नेजा
लांगुरिया
19. उत्तर भारत का सर्वप्रथम पूर्ण साक्षर जिला है-
झांसी
✓ अजमेर
कानपुर
मंदसौर
20. तारकशी के जेवर के लिए प्रसिद्ध है-
✓ नाथद्वारा
भीनमाल
ददरेवा
देशनोक
21. राजस्थान में तीन साके किस जिले में हुए हैं ?
✓ चित्तौड़
जालौर
सीकर
जैसलमेर
चित्तौड़ में सर्वाधिक तीन साके हुए है -
प्रथम साका - यह सन् 1303 में राणा रतनसिंह के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी पद्मनी सहित स्त्रियों ने जौहर किया था।
द्वितीय साका - यह 1534 में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी कर्मावती के नेतृत्व में स्त्रियों ने जौहर किया था।
तृतीय साका - यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ थाजिसमें जयमल और फत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था।
22. "उस्ताद" कहलाने वाले चित्रकारों ने भित्ति चित्र किस नगर में बनाए हैं ?
उदयपुर में
✓ बीकानेर में
जयपुर में
जोधपुर में
23. राज्य में सर्वाधिक पंचायत समितियां किस जिले में हैं ?
जैसलमेर
सिरोही
जयपुर
✓ अलवर
24. राज्य में सर्वाधिक संरक्षित वन भूमि वाले जिले हैं ?
स. माधोपुर व अलवर
चित्तौड़ व बांसवाड़ा
जोधपुर व सिरोही
✓ बारां व करौली
25. राजीव गांधी जनसंख्या मिशन की स्थापना कब की गई ?
15 जुलाई 2001
25 जुलाई 2001
✓ 05 जुलाई 2001
08 जुलाई 2001
राजीव गांधी जनसंख्या मिशन की स्थापना 05 जुलाई 2001 को वर्ष 2011 तक प्रजनन दर 2.1 प्राप्त करना निर्धारित किया गया था। इस मिशन का उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए कार्य योजना बनाकर जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण प्राप्त करना रखा गया।
उदयपुर में
✓ चित्तौड़गढ़ में
बांसवाड़ा में
कोटा में
मीरा-महोत्सव मीरा स्मृति संस्थान, चित्तौड़गढ द्वारा मीरा बाई के जन्म दिवस पर प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा से तीन दिवस के लिए मनाया जाता है।
2. जयपुर की इमारतों पर गुलाबी रंग करवाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है -
सवाई मानसिंह
कल्याण सिंह
✓ सवाई रामसिंह द्वितीय
मिर्जा राजा जयसिंह
1853 में जब वेल्स के राजकुमार आए तो महाराजा रामसिंह के आदेश से पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंग जादुई आकर्षण प्रदान करने की कोशिश की गई थी। उसी के बाद से यह शहर 'गुलाबी नगरी' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुंदर भवनों के आकर्षक स्थापत्य वाले, दो सौ वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जयपुर में जलमहल, जंतर-मंतर, आमेर महल, नाहरगढ़ का किला, हवामहल और आमेर का किला राजपूतों के वास्तुशिल्प के बेजोड़ नमूने हैं।
3. विश्व की सबसे बड़ी तोप किस किले में स्थित है ?
चित्तौड़गढ़ दुर्ग
मेहरानगढ़ दुर्ग
✓ जयगढ़ दुर्ग
नाहरगढ़ दुर्ग
जयपुर के जयगढ़ स्थित किले पर पहियों पर रखी जयबाण तोप विश्व की सबसे बड़ी तोप के रूप में प्रसिद्ध है।
4. गालव ऋषि का आश्रम जो वर्तमान में "मंकी वैली" के उपनाम से प्रसिद्ध है -
पंचकुर
✓ गलता
पुष्कर
चावंड
ऋषि गालव की पवित्र तपोभूमि गलता जयपुर स्थित एक प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है।
5. रमकडा उद्योग (सोप स्टोन के तराशे हुए खिलौने) किस जिले के प्रसिद्ध हैं ?
बीकानेर
हनुमानगढ़
✓ डूंगरपुर
नागौर
डूंगरपुर ग्रीन मार्बल एवं सोप स्टोन के वैश्विक निर्यात हेतु प्रसिद्ध है।
6. हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, उदयपुर के जिंक स्मेल्टर राजस्थान में कहां स्थित हैं ?
चंदेरिया, अकोला, देबारी
देबारी, अकोला
✓ देबारी, चंदेरिया
चंदेरिया, अकोला
7. किस झील पर शाहजहां द्वारा 1627 ई. में बारहदरियों का निर्माण किया गया ?
फतेहसागर झील
✓ आना सागर झील
कोलायत झील
सांभर झील
सम्राट शाहजहाँ ने सन् 1627 में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता 'राजा अरणो रा आनाजी' द्वारा 1135 से 1150 के बीच निर्मित आनासागर झील, अजमेर में लगभग 1240 फीट लम्बा कटहरा लगवाकर और बेहतरीन संगमरमर की पांच बारहदारियाँ बनवाई थी। साथ ही यहाँ शाहजहाँ ने झील की पाल पर संगमरमर की सुंदर बारहदरी का निर्माण करवाया था।
8. राजस्थान के प्रथम वित्त मंत्री कौन थे ?
जमनालाल बजाज
✓ चंदनमल बैद
हीरालाल शास्त्री
टीकाराम पालीवाल
9. देव सोमनाथ मेला किस जिले में भरता है ?
भीलवाड़ा
हनुमानगढ़
✓ डूंगरपुर
श्रीगंगानगर
देव सोमनाथ डूंगरपुर से 24 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित है। देव सोमनाथ सोम नदी के किनार बना एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर के बार में माना जाता है कि इसका निर्माण विक्रम संवत 12 शताब्दी के आसपास हुआ था।
10. राजस्थान में दरियां बनाने का काम किस स्थान पर विशेष रूप से किया जाता है ?
लेटा [जालोर]
तनसुख [जोधपुर]
खंडेला [सीकर]
✓ टांकला [नागौर]
नागौर के टांकला की दरियां, यहां के हस्त औजार, मकराना मार्बल उत्पाद ने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई है।
11. मारवाड़ का लघु माउंट कौन-सा स्थान कहलाता है ?
डीडवाना [नागौर]
रणथम्भौर [स. माधोपुर]
फतेहपुर शेखावाटी [सीकर]
✓ पीपलूट [बाड़मेर]
12. भारत का सर्वाधिक ऊन उत्पादक राज्य है -
गुजरात
उत्तरप्रदे
✓ राजस्थान
मध्यप्रदेश
देश के कुल ऊन उत्पादन में सर्वाधिक 40 प्रतिशत योगदान राजस्थान का है। एशिया की सबसे बडी ऊन की मण्डी बीकानरे में स्थित है।
13. राजस्थान राज्य अभिलेखागार कहां स्थित है ?
जयपुर
✓ बीकानेर
उदयपुर
जोधपुर
बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार देश के सबसे अच्छे और विश्व के चर्चित अभिलेखागारों में से एक है. इस अभिलेखागार की स्थापना 1955 में हुई और यह अपनी अपार व अमूल्य अभिलेख निधि के लिए प्रतिष्ठित है।
14. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान कहां स्थित है ?
✓ जोधपुर
दौसा
अजमेर
सीकर
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की स्थापना जोधपुर में सन् 1950 में की गई थी।
15. अमेरिकन कपास राजस्थान के किस जिले में होती है ?
✓ श्रीगंगानगर
सीकर
दौसा
भरतपुर
राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में अमेरिकन कपास प्राप्त की जाती है।
16. राज्य में तहसीलों की सर्वाधिक संख्या किस जिले में है ?
जोधपुर
उदयपुर
✓ जयपुर
गंगानगर
17. राजस्थान में रॉक फॉस्फेट कहां पाया जाता है ?
✓ उदयपुर
बांसवाड़ा
भीलवाड़ा
रामपुरा
18. राजस्थान का खेल नृत्य है -
झूमर
झूमरा
✓ नेजा
लांगुरिया
19. उत्तर भारत का सर्वप्रथम पूर्ण साक्षर जिला है-
झांसी
✓ अजमेर
कानपुर
मंदसौर
20. तारकशी के जेवर के लिए प्रसिद्ध है-
✓ नाथद्वारा
भीनमाल
ददरेवा
देशनोक
21. राजस्थान में तीन साके किस जिले में हुए हैं ?
✓ चित्तौड़
जालौर
सीकर
जैसलमेर
चित्तौड़ में सर्वाधिक तीन साके हुए है -
प्रथम साका - यह सन् 1303 में राणा रतनसिंह के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी पद्मनी सहित स्त्रियों ने जौहर किया था।
द्वितीय साका - यह 1534 में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी कर्मावती के नेतृत्व में स्त्रियों ने जौहर किया था।
तृतीय साका - यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ थाजिसमें जयमल और फत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था।
22. "उस्ताद" कहलाने वाले चित्रकारों ने भित्ति चित्र किस नगर में बनाए हैं ?
उदयपुर में
✓ बीकानेर में
जयपुर में
जोधपुर में
23. राज्य में सर्वाधिक पंचायत समितियां किस जिले में हैं ?
जैसलमेर
सिरोही
जयपुर
✓ अलवर
24. राज्य में सर्वाधिक संरक्षित वन भूमि वाले जिले हैं ?
स. माधोपुर व अलवर
चित्तौड़ व बांसवाड़ा
जोधपुर व सिरोही
✓ बारां व करौली
25. राजीव गांधी जनसंख्या मिशन की स्थापना कब की गई ?
15 जुलाई 2001
25 जुलाई 2001
✓ 05 जुलाई 2001
08 जुलाई 2001
राजीव गांधी जनसंख्या मिशन की स्थापना 05 जुलाई 2001 को वर्ष 2011 तक प्रजनन दर 2.1 प्राप्त करना निर्धारित किया गया था। इस मिशन का उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए कार्य योजना बनाकर जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण प्राप्त करना रखा गया।
RAJASTHAN
''या तो सरगां ने सरमावे,
इण पर देव रमण ने आवे।
इणरो यश नर-नारी गावे,
धरती धोराँ री, मीठा मोराँ री''
इण पर देव रमण ने आवे।
इणरो यश नर-नारी गावे,
धरती धोराँ री, मीठा मोराँ री''
Wednesday, December 14, 2011
राहुल सोनिया और मिडिया
122 करोड़ लोगो के
भाग्यविधाता सोनिया और राहुल ने
आजतक स्वतंत्र प्रेस चर्चा में
हिस्सा क्यों नहीं लिया और कालाधन पर
कभी भी राय नहीं दी जानिए , क्यों? जरुर
पढ़ें और अग्रेषित करे.....* (शेयर करें ) 1-
राहुल और सोनिया के सोचने
का दायरा बहुत सीमित है और
इनका सामान्य ज्ञान भी बहुत कम है,
इसलिए ये प्रेस कांफ्रेंस में
सवालों का जबाब देते समय कुछ ऐसा बोल
जायेंगे जिससे की इनकी हकीकत जनता के
सामने आ जाएगी. 2-सोनिया को भारत
की कोई भी भाषा नहीं आती और कम
पढ़ी लिखी होने के कारण
इनको सार्वजनिक वाद संवाद से दूर
रखा जाता है. सोनिया को आप सुन सकते है
उनसे कुछ पूंछ नहीं सकते है. भारत
का नेता तो मिडिया के पीछे घूमता है
जबकि सोनिया और राहुल को कैमरे और
वाद विवाद से बचाकर रखा जाता है, इसके
पीछे कारण क्या है? 3-कांग्रेस सरकार एक
ही विषय को कई लोगो द्वारा जनता के
सामने लाती है और उसमे
सोनिया या राहुल का नाम तब तक
नहीं उछाला जाता है जब तक की चीजे
सबको स्वीकार्य न हो जैसे ही स्वीकार्य
निष्कर्ष निकलता है, उसमे राहुल और
सोनिया की सहमति को मिडिया से
प्रचारित किया जाता है.
यदि पासा उलटा पड़ जाये तो उसे सरकार
के मथ्थे मढ़ दिया जाता है और प्रचारित
किया जाता है की इसे सोनिया और राहुल
का समर्थन नहीं है और ये सब परदे के पीछे से
मिडिया के द्वारा चलाया जाता है. 4-
भारत का कोई नेता जनता की राय से
बड़ा नहीं होता है, लेकिन आज तक
सोनिया और राहुल ने अपने
विदेशी दौरों का विवरण कही भी दर्ज
नहीं कराया है की वे कब कब
कहा कहा किस किस काम से कितने दिनों के
लिए विदेश गए.
इसकी जबाबदेही किसकी है, क्या ये
जिम्मेदार सांसद नहीं है. 5-हमें उस दिन
का इंतज़ार है जब मिडिया चनेलो पर
राहुल या सोनिया कालेधन को वापस लाने
पर चर्चा करते दिखेंगे. आखिर
उनकी ऐसी क्या कमजोरी है की उन्होंने
कालाधन के विषय पर एक भी सार्वजनिक
वक्तव्य अभी तक नहीं दिया है जबकि यह
भारत के लिए बहुत ही महत्वपर्ण विषय है
और 400 लाख करोड़ से
ज्यादा का कालाधन विदेशो में
जमा होना साबित हो चूका है और सब
मानते है की कालाधन एक हकीकत है,
इसकी मात्र और जगह , मालिकाना हक़
बहस का विषय हो सकता है लेकिन इसे लाने
के लिए किये जाने वाले उपायों पर
सबको राय देना चाहिए क्या ये देश
उन्ही का है जिनके घर का कोई शहीद
हो जाता है. 6-कालाधन और भ्रष्टाचार व्
महगाई तीन प्रमुख मुद्दे हैं, जिसमे
कालाधन का मुद्दा ऐसा है जिसे बहुत
आसानी के साथ गारंटी के साथ बहुत कम
समय में परिणाम दिया ज़ा सकता है,
बाकि दो मुद्दे कभी न ख़तम होने वाले मुद्दे
है जिसे बाबा रामदेव और अन्ना जी के
तरीके से ही निपटा ज़ा सकता है. अब
तो बाबा रामदेव जी कालाधन वापस लाने
की युक्ति भी अपने शिविरों में सार्वजनिक
रूप से बता रहे हैं क्या सरकार के लोग
इसका खंडन या समर्थन नहीं कर सकते. 4
जून की घटना पर आजतक राहुल और
सोनिया ने अपना बयान
क्यों नहीं दिया जबकि यह घटना सरकार
बदल देने वाली घटना है, क्या कांग्रेस
को अपने वोटिंग मशीनों पर
इतना ज्यादा भरोसा हो चुका है. 7-
कालाधन आना शुरू होते भारत
की काया पलट होना भी शुरू
हो जायेगा क्योकि 20 करोड़
बेरोजगारो के स्थाई कामो का इंतजाम
होना शुरू हो जायेगा और भारत
की उत्पादन और बाजार दोनों ही कई
गुना बढ़ जायेगे और भारत की विश्व
की सबसे बड़ी शक्ति बनाने का रास्ता शुरू
हो जायेगा तो क्या सोनिया और राहुल
भारत की विश्वशक्ति के रूप में
देखना नहीं चाहते है. सोनिया और राहुल में
ऐसा क्या विशेष गुण है जो भारत की सबसे
बड़ी राजनैतिक पार्टी में सत्ता के केंद्र
बने हुए है इन दोनों लोगो से ज्यादा सक्षम
तो भारत का हर नेता है
तो इनको शक्ति दिलाने के पीछे कौन
सी महाशक्ति काम कर रही है. *निश्चय
ही वह महाशक्तिया इस महान भारत
भूमि की कतई नहीं हो सकती है....*
यदि सहमत है तो अग्रेषित करे...( शेयर
करें ) भारत माता की जय हो वन्देमातरम !
भाग्यविधाता सोनिया और राहुल ने
आजतक स्वतंत्र प्रेस चर्चा में
हिस्सा क्यों नहीं लिया और कालाधन पर
कभी भी राय नहीं दी जानिए , क्यों? जरुर
पढ़ें और अग्रेषित करे.....* (शेयर करें ) 1-
राहुल और सोनिया के सोचने
का दायरा बहुत सीमित है और
इनका सामान्य ज्ञान भी बहुत कम है,
इसलिए ये प्रेस कांफ्रेंस में
सवालों का जबाब देते समय कुछ ऐसा बोल
जायेंगे जिससे की इनकी हकीकत जनता के
सामने आ जाएगी. 2-सोनिया को भारत
की कोई भी भाषा नहीं आती और कम
पढ़ी लिखी होने के कारण
इनको सार्वजनिक वाद संवाद से दूर
रखा जाता है. सोनिया को आप सुन सकते है
उनसे कुछ पूंछ नहीं सकते है. भारत
का नेता तो मिडिया के पीछे घूमता है
जबकि सोनिया और राहुल को कैमरे और
वाद विवाद से बचाकर रखा जाता है, इसके
पीछे कारण क्या है? 3-कांग्रेस सरकार एक
ही विषय को कई लोगो द्वारा जनता के
सामने लाती है और उसमे
सोनिया या राहुल का नाम तब तक
नहीं उछाला जाता है जब तक की चीजे
सबको स्वीकार्य न हो जैसे ही स्वीकार्य
निष्कर्ष निकलता है, उसमे राहुल और
सोनिया की सहमति को मिडिया से
प्रचारित किया जाता है.
यदि पासा उलटा पड़ जाये तो उसे सरकार
के मथ्थे मढ़ दिया जाता है और प्रचारित
किया जाता है की इसे सोनिया और राहुल
का समर्थन नहीं है और ये सब परदे के पीछे से
मिडिया के द्वारा चलाया जाता है. 4-
भारत का कोई नेता जनता की राय से
बड़ा नहीं होता है, लेकिन आज तक
सोनिया और राहुल ने अपने
विदेशी दौरों का विवरण कही भी दर्ज
नहीं कराया है की वे कब कब
कहा कहा किस किस काम से कितने दिनों के
लिए विदेश गए.
इसकी जबाबदेही किसकी है, क्या ये
जिम्मेदार सांसद नहीं है. 5-हमें उस दिन
का इंतज़ार है जब मिडिया चनेलो पर
राहुल या सोनिया कालेधन को वापस लाने
पर चर्चा करते दिखेंगे. आखिर
उनकी ऐसी क्या कमजोरी है की उन्होंने
कालाधन के विषय पर एक भी सार्वजनिक
वक्तव्य अभी तक नहीं दिया है जबकि यह
भारत के लिए बहुत ही महत्वपर्ण विषय है
और 400 लाख करोड़ से
ज्यादा का कालाधन विदेशो में
जमा होना साबित हो चूका है और सब
मानते है की कालाधन एक हकीकत है,
इसकी मात्र और जगह , मालिकाना हक़
बहस का विषय हो सकता है लेकिन इसे लाने
के लिए किये जाने वाले उपायों पर
सबको राय देना चाहिए क्या ये देश
उन्ही का है जिनके घर का कोई शहीद
हो जाता है. 6-कालाधन और भ्रष्टाचार व्
महगाई तीन प्रमुख मुद्दे हैं, जिसमे
कालाधन का मुद्दा ऐसा है जिसे बहुत
आसानी के साथ गारंटी के साथ बहुत कम
समय में परिणाम दिया ज़ा सकता है,
बाकि दो मुद्दे कभी न ख़तम होने वाले मुद्दे
है जिसे बाबा रामदेव और अन्ना जी के
तरीके से ही निपटा ज़ा सकता है. अब
तो बाबा रामदेव जी कालाधन वापस लाने
की युक्ति भी अपने शिविरों में सार्वजनिक
रूप से बता रहे हैं क्या सरकार के लोग
इसका खंडन या समर्थन नहीं कर सकते. 4
जून की घटना पर आजतक राहुल और
सोनिया ने अपना बयान
क्यों नहीं दिया जबकि यह घटना सरकार
बदल देने वाली घटना है, क्या कांग्रेस
को अपने वोटिंग मशीनों पर
इतना ज्यादा भरोसा हो चुका है. 7-
कालाधन आना शुरू होते भारत
की काया पलट होना भी शुरू
हो जायेगा क्योकि 20 करोड़
बेरोजगारो के स्थाई कामो का इंतजाम
होना शुरू हो जायेगा और भारत
की उत्पादन और बाजार दोनों ही कई
गुना बढ़ जायेगे और भारत की विश्व
की सबसे बड़ी शक्ति बनाने का रास्ता शुरू
हो जायेगा तो क्या सोनिया और राहुल
भारत की विश्वशक्ति के रूप में
देखना नहीं चाहते है. सोनिया और राहुल में
ऐसा क्या विशेष गुण है जो भारत की सबसे
बड़ी राजनैतिक पार्टी में सत्ता के केंद्र
बने हुए है इन दोनों लोगो से ज्यादा सक्षम
तो भारत का हर नेता है
तो इनको शक्ति दिलाने के पीछे कौन
सी महाशक्ति काम कर रही है. *निश्चय
ही वह महाशक्तिया इस महान भारत
भूमि की कतई नहीं हो सकती है....*
यदि सहमत है तो अग्रेषित करे...( शेयर
करें ) भारत माता की जय हो वन्देमातरम !
Wednesday, December 7, 2011
RPSC 2nd grade GK ANSWER KEY 7 DEC 2011
RPSC 2nd grade GK
paper Key
December 7th, 2011 by admin
Here we are
providing key of RPSC 2nd grade
GK paper Key. us
this key after a lot hard work……
still there will be wrong
answer/s….if you find please
write here….Really final answers
will be decided by RPSC.
Note : This key is based on
SERIES B Q.No.
Ans
1
B
26
A
51
C
76
C
2
D
27
C
52
B
77
A
3
C
28
B
53
C
78
A
4
B
29
A
54
B
79
D
5
A
30
A
55
A
80
C
6
D
31
D
56
D
81
B
7
D
32
C
57
B
82
A
8
C
33
B
58
C
83
C
9
B
34
A
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25
d
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75
D
100
D
paper Key
December 7th, 2011 by admin
Here we are
providing key of RPSC 2nd grade
GK paper Key. us
this key after a lot hard work……
still there will be wrong
answer/s….if you find please
write here….Really final answers
will be decided by RPSC.
Note : This key is based on
SERIES B Q.No.
Ans
1
B
26
A
51
C
76
C
2
D
27
C
52
B
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3
C
28
B
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C
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5
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C
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C
57
B
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A
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B
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C
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C
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B
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A
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C
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A
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B
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C
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C
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D
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C
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A
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B
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A
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25
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A
75
D
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D
Thursday, December 1, 2011
एफडिआइ के नुकसान
बहुब्रांड खुदरा कारोबार में सरकार ने
एफडीआई को लेकर जो चर्चा पत्र पेश
किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू
खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े
शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल
मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के
अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा,
इसको देखते हुए कारोबारी तबका हर
संभव तरीके से इसका कड़ा विरोध करेगा।
यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान
नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों,
ट्रांसपोर्टर, कामगारों और
खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के
लिए घातक साबित होगा।
अगर भारत में बहुब्रांड खुदरा को मंजूरी दे
दी जा जाती है तो वैश्विक
रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते
ही ज्यादा से ज्यादा बाजार
हिस्सेदारी हासिल करना होगा।
उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं,
संसाधनों और सरकार के साथ
नजदीकी को देखते हुए उनके लिए
ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल
नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर
काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने
तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से
उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी।
चर्चा पत्र में इस बात का जिक्र
किया गया है कि खुदरा कारोबार के
मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है
और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत
अदा करता है उसका केवल एक तिहाई
ही किसान को मिलता है और
बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब
बिचौलियों की बात उठी है तो यह
भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन
लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले,
ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे
कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक
दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर
बिचौलियों का काम करते हैं
जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके
अलावा बिजली खपत, गोदाम और
ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत
ज्यादा होते हैं।
हमारे बिचौलिये न केवल
अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश
के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में
मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर
जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप
लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद
है। वर्ष 2005 से देश में बड़े
कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में
शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें।
उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार
में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर
उनसे भी ज्यादा हैं।
इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे
वाली बात लागू होती है तो उन पर
ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर
कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने
का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय
कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक
जरिया मात्र है। सरकार को बहुब्रांड
खुदरा कारोबार में एफडीआई
को मंजूरी देने के बजाय
मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे
को सूक्ष्म, लघु और मझोले
उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर
विकसित करना चाहिए। सरकार को कम
ब्याज दर पर कर्ज
की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे
खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में
मदद
मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।
एफडीआई को लेकर जो चर्चा पत्र पेश
किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू
खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े
शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल
मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के
अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा,
इसको देखते हुए कारोबारी तबका हर
संभव तरीके से इसका कड़ा विरोध करेगा।
यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान
नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों,
ट्रांसपोर्टर, कामगारों और
खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के
लिए घातक साबित होगा।
अगर भारत में बहुब्रांड खुदरा को मंजूरी दे
दी जा जाती है तो वैश्विक
रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते
ही ज्यादा से ज्यादा बाजार
हिस्सेदारी हासिल करना होगा।
उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं,
संसाधनों और सरकार के साथ
नजदीकी को देखते हुए उनके लिए
ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल
नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर
काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने
तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से
उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी।
चर्चा पत्र में इस बात का जिक्र
किया गया है कि खुदरा कारोबार के
मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है
और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत
अदा करता है उसका केवल एक तिहाई
ही किसान को मिलता है और
बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब
बिचौलियों की बात उठी है तो यह
भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन
लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले,
ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे
कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक
दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर
बिचौलियों का काम करते हैं
जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके
अलावा बिजली खपत, गोदाम और
ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत
ज्यादा होते हैं।
हमारे बिचौलिये न केवल
अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश
के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में
मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर
जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप
लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद
है। वर्ष 2005 से देश में बड़े
कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में
शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें।
उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार
में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर
उनसे भी ज्यादा हैं।
इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे
वाली बात लागू होती है तो उन पर
ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर
कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने
का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय
कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक
जरिया मात्र है। सरकार को बहुब्रांड
खुदरा कारोबार में एफडीआई
को मंजूरी देने के बजाय
मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे
को सूक्ष्म, लघु और मझोले
उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर
विकसित करना चाहिए। सरकार को कम
ब्याज दर पर कर्ज
की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे
खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में
मदद
मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।
Saturday, November 19, 2011
KUMAR VISVASH
बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह
नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह
नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार
का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह
नहीं पाया
नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह
नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार
का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह
नहीं पाया
Saturday, November 12, 2011
Sunday, November 6, 2011
Wednesday, February 16, 2011
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