Popular Posts

Tuesday, September 25, 2012

भारत में विदेशी किराना स्टोर के मायने

हाल ही में प्रधानमंत्री ने  भारतीय खुदरा बाजार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में एकल ब्रांड में १००% व मल्टीब्रांड में ५१% निवेश की अनुमती दी | इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये आर्थिक सुधारों कि सज्ञां दि जा रही है| इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक चर्चाओं चली वदोनों तरफ  से अपने अपने तर्क दिए | प्रधानमंत्री ने देश के  नाम संबोधन में अपना पक्ष रखा और आर्थिक सुधारों के  सकारात्मक प्रभाव का भरोसा दिलाया|

बताया जा रहा कि इससे किसानों को अपने उत्पादन कि अच्छी कीमत मिलेगी तथा नई तकनीक उपलब्ध होगी| लेकिन आंकड़े बताते ह कि अमेरिका इंगलैंड मेक्सिको में अफडीआई कि नीतियों से तंग आकर किसान  कर्षि वयवसाय को छोड़ रहे ह|  बताया जा रहा
 ह कि इससे बिचोलिये के हट जाने से उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को फायदा मिलेगा पर सवालयह कि ये बिचोलीये कोन ह ये हम में से ही कुछ लोग ह जो परिवहन व स्टोर करने का काम करते ह तो इसमे  इनको रोजगार मिल जाने में बुराई क्या ह ?  पर विपक्ष  का तर्क ये कि इससे उत्पाद महंगा हो जाता ह इस पर मेरा तर्क  ये ह कि अभी हमारे देश जो स्टोर ह वो कोनसे सस्ते उत्पाद उपलब्ध करा रहे ह  RELIANCE BIG BAJAR  MOREआदि इनके बीच तो बिचोलिये भी नहीं ह तो क्या गारंटी ह कि FDI RETAIL के आने से सस्ते उत्पाद उपलब्ध होंगे|

FDI RTAIL के आने से  बताया जा रहा ह कि रोजगार में अवसर बढ़ेंगे परन्तु भारतीय खुदरा बाजार 4करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता ह इसका विकल्प fdi retail नहीं हो सकताहै | 4करोड़ लोगों का रोजगार  FDI RETAIL  शायद सारे विश्व  में नहीं देता होगा

विदेशी किराना  स्टोर के आने से  भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश होगा  इससे हमारी अर्थव्यवस्था मजबूतहोगी पर ये लोग ये भूल जाते ह कि विदेशी किराना  स्टोर 70% उत्पाद विदेशों से आयात करेगीं इससे भारतीय मुद्रा विदेशों में जाएगी रुपए का मूल्य गिरेगा | भारतीय उधोग चोपट होंगे  और हम कहते ह अर्थव्यवस्था मजबूत होगी

एक बार सोचने कि जरूरत है|

Tuesday, April 17, 2012

3rd grade teacher

किस जिले से कितने आवेदन
जिला लेवल वन लेवल टू कुल पद
अजमेर 15716 18616 34332 1491
अलवर 36139 31705 67844 1866
बांसवाड़ा 7452 5069 12521 560
बारां 7062 6373 13435 1232
बाड़मेर 53571 58028 111599
2832
भरतपुर 10740 12005 22745 1140
भीलवाड़ा 26007 34919 60926
1999
बीकानेर 20808 8298 29106 881
बूंदी 8550 8919 17469 826
चित्तौडग़ढ़ 29793 34266 64059
1972
चूरू 16954 193 36331 1081
दौसा 6909 5932 12841 494
धौलपुर 4503 3718 8221 626
डूंगरपुर 2939 289 3228 235
हनुमानगढ़ 11129 11978 23107
751
जयपुर 17495 16357 33852 568
जैसलमेर 86 3919 12695 505
जालौर 22891 24904 495 1478
झालावाड़ 15121 18011 33132
1465
झुंझुनू 228 151 379 20
जोधपुर 42457 13022 55479 1677
करौली 6389 5066 11455 472
कोटा 5810 5654 11464 692
नागौर 53031 51797 104828
3022
पाली 47663 52029 99692 2614
प्रतापगढ़ 10276 7362 17638
1174
राजसमंद 39079 46735 85814
2072
स.माधोपुर6630 5113 11743 473
सीकर 16255 14791 31046 704
सिरोही 5153 4330 9483 720
श्रीगंगानगर15890 14736 30626
1038
टोंक 7821 7112 14933 586
उदयपुर 22782 18887 41669 2278
राज्य में स्थिति
आवेदन पद
1171487 39544
लेवल वन
602019 10609
लेवल टू
569468 28935
जयपुर में लेवल वन के 155 पद, 17495
आवेदन आए

Saturday, March 3, 2012

पुरुष को गठरी बना ले चलने में सक्षम हो नारी

प्रसंगवश . प्रख्यात चिंतक राममनोहर
लोहिया का कहना था कि भारतीय
नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने
कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार
नहीं खाई।
हिंदुस्तान के लोग दुनिया के सबसे
ज्यादा उदास लोग हैं, क्योंकि वे
दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और बीमार
लोग हैं। एक और उतना ही बड़ा कारण यह
भी है कि उनके मन में, खासकर इतिहास के
पिछले काल में, खास तरह का झुकाव आ
गया।
वे दुनिया से अलग रहने का एक दर्शन
मानते हैं, जो तर्क में और अंतर्दृष्टि में बहुत
ऊंचा है, लेकिन व्यवहार में वे जिंदगी से
बुरी तरह चिपके रहते हैं। जिंदगी से
उनका मोह इतना ज्यादा होता है
कि किसी कोशिश में अपने को खतरे में
डालने की बजाय, गरीबी और कष्ट
की बुरी हालत में पड़े रहना पसंद करते हैं।
और शक्ति के लोभ का प्रदर्शन इनसे
ज्यादा दुनिया में कहीं और नहीं होता।
मुझे यकीन है कि वर्णो और स्त्रियों के
कटघरे आत्मा के इस पतन के लिए
बुनियादी तौर पर जिम्मेदार हैं। इन
कटघरों में इतनी ताकत है कि ये जोखिम
उठाने और खुशी हासिल करने
की सारी ताकत को खत्म कर दें। जो लोग
समझते हैं कि आधुनिक आर्थिक ढांचे के जरिए
गरीबी मिट जाने पर ये कटघरे अपने आप
टूट जाएंगे, वे बहुत बड़ी गलती करते हैं।
गरीबी और ये कटघरे एक-दूसरे के पैदा हुए
कीड़ों पर पलते हैं।
देश की सारी राजनीति में राष्ट्रीय
सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, चाहे
जानबूझ कर या परंपरा से, कि शूद्रों और
औरतों को, जो हमारी आबादी का तीन-
चौथाई भाग हैं, दबा कर और राजनीति से
अलग रखा जाए।
स्त्रियों की समस्या मुश्किल है, इसमें कोई
शक नहीं। उनकी रसोई, बुरी तरह धुआं देने
वाले चूल्हों की गुलामी बहुत ही बुरी है।
उसे खाना बनाने का एक निश्चित समय
मिलना चाहिए। उसे भुखमरी और
बेकारी के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में
हिस्सा तो लेना ही चाहिए, लेकिन
उसकी समस्या और भी आगे जाती है।
माता-पिताओं ने आंखों में आंसू भरकर मुझे
बताया है कि अगर दहेज की पूरी रकम देने
में कुछ कठिनाई हो, तो उनकी लड़कियों से
किस तरह बुरा बर्ताव किया जाता है और
कभी-कभी मार तक डाला जाता है। जिस
तरह खेती में कभी-कभी मेहनत करने
की बजाय, खेत पट्टे पर उठा देने में
ज्यादा लाभ होता है, उसी तरह कम पढ़ी-
लिखी लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से
अच्छी होती है, क्योंकि उसका दहेज कम
होता है।
दहेज लेने और देने पर
सजा तो मिलनी ही चाहिए, लेकिन
लोगों के दिमाग और उनकी मान्यताओं
को भी बदलना होगा। तस्वीर दिखाकर
या एक सिमटती हुई छाया के हाथों लाए
गए चाय के प्याले के वातावरण में
शादी तय करने का तरीका नाई व
ब्राह्मण के जरिए शादी तय कराने के
पुराने तरीके से भी ज्यादा वाहियात है।
यह ऐसा है कि घोड़े को खरीदते समय उसे
देखे तो, लेकिन न उसके खुर छू सके, न दांत
देख सके।
कोई बीच का रास्ता नहीं है। हिंदुस्तान
को अपना पुराना पौरुष फिर से हासिल
करना होगा, यानी दूसरे शब्दों में, उसे
आधुनिक बनना होगा।
लड़की की शादी करना माता-
पिता की जिम्मेदारी नहीं,
उनकी जिम्मेदारी अच्छी सेहत और
अच्छी शिक्षा देने पर खत्म हो जाती है।
मेरा विश्वास है कि हर पति-पत्नी की,
जिनके तीन बच्चे हो चुके हों, प्रजनन
शक्ति नष्ट कर देनी चाहिए और प्रजनन
शक्ति नष्ट करने या कम से कम गर्भनिरोध
की सुविधाएं हर ऐसे स्त्री व पुरुष
को उपलब्ध होनी चाहिए, जो बच्चे न
पैदा करना चाहते हों।
ब्रह्मचर्य आमतौर पर एक कैद होती है।
ऐसी कैद-आत्माओं से किसकी भेंट
नहीं होती, जिनका कौमार्य उन्हें बांधे
रहता है और जो उत्सुकता से अपने को मुक्त
करने वाले का इंतजार करती हैं?
अब समय है कि युवक और युवतियां इस तरह
के बचपने के खिलाफ विद्रोह करें। उन्हें
हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन-
संबंधों में सिर्फ दो अक्षम्य अपराध हैं :
बलात्कार और झूठ
बोलना या वादा तोड़ना। एक
तीसरा अपराध दूसरे को चोट
या पीड़ा पहुंचाना भी है, जिससे जहां तक
मुमकिन हो, बचना चाहिए।
आज वर्ण और योनि के इन
दो कटघरों को तोड़ने से बड़ा कोई पुण्य
नहीं। युवक और युवतियां सिर्फ
इतना ही याद रखें कि चोट या पीड़ा न
पहुंचाएं और गंदे न हों, क्योंकि स्त्री और
पुरुष का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है।
आज के हिंदुस्तान में एक मर्द और एक औरत
शादी करके जो सात-आठ बच्चे पैदा करते हैं,
उनके बनिस्बत मैं उनको पसंद करूंगा,
जो बिना शादी किए एक भी नहीं या एक
ही पैदा करते हैं। या, लड़की यानी उसके
मां-बाप दहेज देकर, जिसे समाज
कहेगा अच्छी-खासी शादी की, उसको मैं
ज्यादा खराब समझूंगा, बनिस्बत एक
ऐसी लड़की के, जो कि दहेज दिए
बिना दुनिया में आत्म-सम्मान के साथ
चलती है।
मर्द कुछ भी करें, हिंदुस्तान में
उनकी निंदा नहीं होती, लेकिन
औरतों की निंदा हो जाती है। संसार में
सभी जगह थोड़ा-बहुत ऐसा है। यह
वृत्ति भी छूट जानी चाहिए। और
खासतौर से राजनीति में जो औरतें आएंगी,
वे तो थोड़ी-बहुत तेजस्वी होंगी, घर
की गुड़िया तो नहीं होंगी। जब वह
तेजस्वी होगी, तो जो परंपराग्रस्त
संस्कार हैं, उनसे टकराव हो ही जाएगा।
आज के हिंदुस्तान में किसी औरत
की निंदा तो करनी ही नहीं चाहिए।
केवल जहां तक विचार का संबंध है, उसमें
भी, मैं समझता हूं, बहुत संभल कर उसके बारे
में कुछ बोलना चाहिए।
भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने
कि कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार
नहीं खाई। नारी को गठरी के समान
नहीं बनाना है, परंतु
नारी इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए
कि वक्त पर पुरुष को गठरी बनाकर अपने
साथ ले चले। (लोकभारती प्रकाशन,
इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित

Sarfaroshi ke tamanna ab hamare dil mein hai – Bismil Allahabadi

Sarfaroshi ke tamanna ab
hamare dil mein hai
dekhana hai zor kitna bazu-e-
qatil mein hai
karta nahi kyon dusara kuch bat-
chit
dekhata hun main jise wo chup
teri mahafil mein hai
ae shahid-e-mulk-o-millat main
tere upar nisar
ab teri himmat ka charcha gair
ke mahafil mein hai
waqt aane de bata denge tujhe
ae aasman
hum abhi se kya batayen kya
hamare dil mein hai
khainch kar lai hain sab ko qatl
hone ke umeed
aashiqon ka aj jamghat kucha-e-
qatil mein hai

Thursday, March 1, 2012

~¤NAZAR¤~

~¤NAZAR¤~
~¤NAZAR¤~
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai Arzoo
- 2
Na Kisi Azal Ki Talash Hai ,
Teri Justuzoo Main Jo Kho Gayi -
2
Mujhe Os Nazar Ki Talash Hai ,
Jise Too Kahin Bhi Na Pa Saka -
2
Mujhe Apne Dil Main Vo Mil
Gaya ,
Jise Too Kahin Bhi Na Pa Saka,
Mujhe Apne Dil Main Vo Mil
Gaya ,
Tujhe Zahib Iska Malal Kya - 2
Ye Nazar - Nazar Ki Talash Hai ,
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai
Arzoo . . .
Tujhe Do Jahan Ki Khusi Mili ,
Mujhe Do Jahan Ka Alam Mila ,
Vo Teri Nazar Ki Talash Thi - 2
Ye Meri Nazar Ki Talash Hai ,
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai
Arzoo . . .
Meri Rahaton Ko Mita Ke Bhi ,
Tere Gum Ne Di Mujhe Jindagi ,
Tera Gum Nahin Yun Hin Mil
Gaya - 2
Meri Omra Bhar Ki Talash Hai ,
Tera Gum Nahin Yun Hin Mil
Gaya ,
Meri Omra Bhar Ki Talash Hai ,
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai
Arzoo . . .
Rahe Noor Meri Ye Arzoo ,
Na Rahe Ye Gardish - E -
Justuzoo ,
Jo Fareb - E - Jalva Kha Sake ,
Jo Fareb - E - Jalva Na Kha
Sake ,
Mujhe Os Nazar Ki Talash Hai ,
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai
Arzoo ,
Na Kisi Azal Ki Talash Hai ,
Na Sukoon - E - Dil Ki Hai
Arzoo . . .
Teri Justuzoo Mai Jo Kho Gayi ,
Mujhe Os Nazar Ki Talash Hai ,
Jise Too Kahin Bhi Na Pa Saka ,
Mujhe Apne Dil Mai Vo Mil
Gaya ,
Tujhe Jahib Iska Malal Kya ,
Ye Nazar - Nazar Ki Talash Hai .

Monday, February 27, 2012

नयी पीढी

वर्तमान दौर की युवा पीढ़ी मुझे
ज्यादा ऊर्जावान लगती है। ये खुद
को ज्यादा अच्छे से प्रस्तुत करते हैं। पुराने
समय के बच्चों की तुलना में आज के बच्चे
ज्यादा प्रोफेशनल भी हैं। अगर संगीत के
क्षेत्र की बात की जाए, तो इसमें भी मुझे
बहुत ज्यादा उत्साही युवक दिखाई पड़ते
हैं, लेकिन इनके साथ समस्या एक ही है।
इनमें नतीजे की जल्दी है। ये हर चीज
जल्दी पाना चाहते हैं। सामान्यत: पैसा-
प्रसिद्धि की चाह सभी को रहती है और
यह सब समय आने पर मिलता भी है, लेकिन
बड़े कलाकार जैसा पहनते हैं या जैसा करते
हैं- वैसा करने की कोशिश कहां तक सही है?
व्यक्ति को अपनी हैसियत
पता होनी चाहिए। युवाओं के साथ
यही परेशानी है कि बजाय रियाज करने
के, उनका ध्यान धन-शोहरत पाने पर
रहता है।

Friday, February 17, 2012

-----शहरयार-----

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता
बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

चाणक्य

चाणक्य के 15 सूक्ति वाक्य ----
1) "दूसरो की गलतियों से सीखो अपने
ही ऊपर प्रयोग करके सीखने
को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी."
2)"किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार
नहीं होना चाहिए ---सीधे बृक्ष और
व्यक्ति पहले काटे जाते हैं."
3)"अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब
भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे दंश
भले ही न दो पर दंश दे सकने
की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते
रहना चाहिए. "
4)"हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर
होता है --यह कडुआ सच है."
5)"कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन
सवाल अपने आपसे पूछो ---मैं ऐसा क्यों करने
जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ?
क्या मैं सफल रहूँगा ?"
6)"भय को नजदीक न आने दो अगर यह
नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय
से भागो मत इसका सामना करो ."
7)"दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष
का विवेक और महिला की सुन्दरता है."
8)"काम का निष्पादन करो , परिणाम से
मत डरो."
9)"सुगंध का प्रसार हवा के रुख
का मोहताज़ होता है पर अच्छाई
सभी दिशाओं में फैलती है."
10)"ईस्वर चित्र में नहीं चरित्र में
बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ."
11) "व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है
जन्म से नहीं."
12) "ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर
या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह
तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर
के मित्र ही सुखदाई होते हैं ."
13) "अपने बच्चों को पहले पांच साल तक
खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक
कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह
साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार
करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे
अच्छी मित्र है."
14) "अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के
लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है ."
15) "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है.
शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है.
शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और
सौंदर्य दोनों ही कमजोर हैं ."

Monday, January 2, 2012

संसद और लोकपाल

नया साल नई उम्मीदें लेकर आया है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने
भी उत्साहजनक आश्वासन दिए हैं। लेकिन
बीते साल के अंत में देश ने लोकपाल
का जो हश्र देखा, उसके बाद बहुत
उत्साहित होने की गुंजाइश क्या सचमुच
है? पिछले दिनों लोकपाल पर गतिरोध
को सरकार की हार के रूप में देखा गया,
लेकिन उस दिन हमारा संसदीय लोकतंत्र
पराजित हुआ। उसकी पूर्व
भूमिका अन्ना आंदोलन ने मानो एक दिन
पहले ही बना ली थी, जब मुंबई में वह मन से
कमजोर पड़ा था और उपवास और आंदोलन
का सारा कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर
वापस रालेगण सिद्धि लौट गया था।
लोकसभा और राज्यसभा की तीन
दिनों की आपात बैठक में जो हुआ और जिस
तरह हुआ, उससे एक बात एकदम साफ हो गई
कि सत्ता-वर्ग को लोकपाल
की व्यवस्था स्वीकार नहीं है। सभी कहते
रहे कि वे एक मजबूत लोकपाल चाहते हैं, और
सभी बताते रहे कि मजबूत लोकपाल वह
होगा, जिसमें उनकी गरदन न फंसे। टीम
अन्ना की तरफ से जन लोकपाल
का जो खाका जनता व सरकार के सामने
रखा गया था, दोनों सदनों में किसी ने
गलती से भी उसका जिक्र नहीं किया।
जहां से यह परिकल्पना आई थी और जिसके
जन-समर्थन के आगे सत्ता वर्ग को मजबूर
होकर झुकना पड़ा था, उसका नाम लेने से
सभी बचते रहे, सत्ता व विपक्ष में
ऐसी एका की तरफ हमारा ध्यान
गया या नहीं?
सभी जानते हैं कि जन लोकपाल
की अवधारणा ऐसी है कि उसका कोई
भी संस्करण आप तैयार करेंगे, वह
आपकी मनमानी पर लगाम लगाएगा।
जबकि आजादी के बाद के 65 वर्षों तक
सत्ता वर्ग ऐसी मनोभूमिका में जिया है
कि उसे मनमानी अपना जन्मसिद्ध
अधिकार लगने लगी है। इसीलिए आप जन
लोकपाल लाइए या ‘राइट टु रिजेक्ट’
का विकल्प रखने की बात कीजिए,
आपको कभी कोई उत्साहप्रद प्रत्युत्तर
नहीं मिलेगा।
प्रतिनिधि वापसी का अधिकार
जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के
आंदोलन की मुख्य मांगों में एक था। उसके
लिए समर्थन जुटाने के हस्ताक्षर अभियान
के परिपत्र पर
पहला हस्ताक्षरजयप्रकाश नारायण ने
किया था।
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से जब हमने
उस परिपत्र पर हस्ताक्षर करने
का आग्रह किया, तो वह उसे परे हटाते हुए
बोले, हमारे डेथ वारंट पर
हमारा ही हस्ताक्षर चाहते हैं आप! यह है
सत्ता-वर्ग का मानस, जो अपने लिए
पूरा लोकतंत्र चाहता है, लेकिन
बाकी सारे देश के लिए लोकतंत्र
की परिकल्पना उसकी कृपा से छूटा हुआ
जूठन भर है।
कांग्रेसी लोकपाल में
जो व्यवस्था सोची गई है, वह अत्यंत
जटिल है, ऐसा कहना सच नहीं है। सचाई
यह है कि वह राजनीतिक व्यवस्था के तौर
पर कहीं से भी ईमानदार नहीं है। विपक्ष
ने दोनों सदनों में इस पर जैसे आक्रमण किए,
उससे न सिर्फ यह साबित हुआ कि वह
सत्ता-पक्ष को परेशानी में डालकर
उसका राजनीतिक
फायदा उठाना चाहता है, बल्कि यह
भी साबित हुआ कि वह लोकपाल
नहीं चाहता, किसी भी तरह के लोकपाल
की व्यवस्था में उसकी और कपिल सिब्बल
की आस्था में कोई फर्क नहीं है। इसलिए
कपिल सिब्बल ने लोकसभा में और अभिषेक
मनु सिंघवी ने राज्यसभा में सरकारी पक्ष
को जिस तरह सामने रखा, उसमें मुग्ध कर
देने वाली कानूनी दक्षता थी, संविधान
की बारीकियों का खुलासा था और
विपक्ष को खोखला बताने वाले विष बुझे
तीर थे, नहीं थी, तो केवल आने वाले
दिनों में विकसित होते लोकतंत्र के
प्रति कोई आस्था।
विपक्ष की बागडोर अरुण जेटली और
सुषमा स्वराज के हाथों में थी।
दोनों भाषा के धनी और संसद को हथियार
के तौर पर बरतने में पटु हैं। लोकपाल और
अन्ना की आड़ में सुषमा स्वराज खुले तौर
पर भाजपा की राजनीति को आगे बढ़ाने में
लगी थीं, इसीलिए सबसे ज्यादा भद
भी उनकी ही पिटी। अरुण जेटली ने
सावधानी बरती और विपक्ष को साथ लेने
की भरपूर कोशिश की।
उनकी ही रणनीति का नतीजा था कि सपा,
बसपा और तृणमूल को लोकसभा से एकदम
अलग रुख लेने पर मजबूर होना पड़ा।
सरकार इसे पहचान रही थी और इसीलिए
उसने मतदान से कन्नी काट ली।
लोकसभा के सबसे बुजुर्ग और जहीन सदस्य
प्रणब मुखर्जी ने उस दिन जितना और
जो कुछ कहा, उसमें उनकी उलझन साफ
दिखाई दे रही थी, क्योंकि उन्हें
जिंदा मछली निगलनी पड़ रही थी। वह
प्रणब मुखर्जी ही थे, जिन्होंने
रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के पिछले
उपवास के अंत में सेंस ऑफ हाउस
का रास्ता निकाला था और उस पर
भरोसा करके अन्ना हजारे ने
अपना उपवास तोड़ा था। अब उसी सेंस ऑफ
द हाउस की मिट्टी पलीद कर
जो लोकपाल सामने लाया गया, उसके छद्म
को पीना प्रणब मुखर्जी को भी भारी पड़
रहा था। वह उस दिन लोकसभा में भीष्म
की भूमिका में थे; जब भी लोकपाल
का इतिहास लिखा जाएगा, वह इसी रूप
में याद किए जाएंगे।
अब आगे क्या? राज्यसभा में इस लोकपाल
का शव पड़ा है, सरकारी वेताल इसे फिर से
जल्दी ही कंधे पर उठाएगा, इसकी कोई
संभावना नहीं लगती। पांच राज्यों में
होने वाले चुनावों में टीम अन्ना इसे
मुद्दा बनाने की सोच रही है। लेकिन
चुनाव के गड्ढे में आंदोलन को उतारने
की गलती ऐसी भी हो सकती है, जिसमें से
एक नई पराजय सामने आए। टीम
अन्ना को यह
तो बताना ही होगा कि इस बहस के बाद
हमारी राजनीति का जो चेहरा सामने
आया है, क्या उसके बाद भी सिर्फ कांग्रेस
को वोट न देने का कोई औचित्य होगा?