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Thursday, December 1, 2011

एफडिआइ के नुकसान

बहुब्रांड खुदरा कारोबार में सरकार ने
एफडीआई को लेकर जो चर्चा पत्र पेश
किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू
खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े
शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल
मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के
अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा,
इसको देखते हुए कारोबारी तबका हर
संभव तरीके से इसका कड़ा विरोध करेगा।
यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान
नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों,
ट्रांसपोर्टर, कामगारों और
खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के
लिए घातक साबित होगा।
अगर भारत में बहुब्रांड खुदरा को मंजूरी दे
दी जा जाती है तो वैश्विक
रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते
ही ज्यादा से ज्यादा बाजार
हिस्सेदारी हासिल करना होगा।
उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं,
संसाधनों और सरकार के साथ
नजदीकी को देखते हुए उनके लिए
ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल
नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर
काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने
तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से
उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी।
चर्चा पत्र में इस बात का जिक्र
किया गया है कि खुदरा कारोबार के
मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है
और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत
अदा करता है उसका केवल एक तिहाई
ही किसान को मिलता है और
बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब
बिचौलियों की बात उठी है तो यह
भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन
लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले,
ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे
कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक
दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर
बिचौलियों का काम करते हैं
जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके
अलावा बिजली खपत, गोदाम और
ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत
ज्यादा होते हैं।
हमारे बिचौलिये न केवल
अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश
के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में
मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर
जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप
लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद
है। वर्ष 2005 से देश में बड़े
कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में
शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें।
उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार
में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर
उनसे भी ज्यादा हैं।
इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे
वाली बात लागू होती है तो उन पर
ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर
कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने
का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय
कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक
जरिया मात्र है। सरकार को बहुब्रांड
खुदरा कारोबार में एफडीआई
को मंजूरी देने के बजाय
मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे
को सूक्ष्म, लघु और मझोले
उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर
विकसित करना चाहिए। सरकार को कम
ब्याज दर पर कर्ज
की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे
खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में
मदद
मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।

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