Popular Posts

Monday, December 26, 2011

at

षि-मुनियों के लिए इंद्र के दरबार में
विशेष नृत्य का आयोजन था। नृत्य धीरे-
धीरे ऋषि-मुनियों के दिलो-दिमाग पर
हावी हो रहा था। किसी कोने से आवाज
आयी – आभूषण उतारो। अप्सरा ने नाचते-
नाचते आभूषण उतार दिये। कुछ देर बाद
दूसरे कोने से आवाज आयी – वस्त्र उतारो।
अप्सरा ने आदेश/आग्रह का पालन किया।
रात के तीसरे पहर किसी तंग गली के डांस
बार और सात-सितारा होटल के
डिस्कोथेक का माहौल देवलोक के उस कक्ष
में तारी था। उत्तेजक उन्माद में ऋषि-
मुनि दर्शन और अध्यात्म के अध्याय भूल चुके
थे या यों कहें कि इनमें हवस का भी एक
परिशिष्ट जोड़ रहे थे। अब आवाजें जल्दी-
जल्दी आने लगी थीं – और उतारो, और
उतारो, थोड़ा और… अब वह बिल्कुल नग्न
थी। उत्तेजना चरम पर थी।
सहोदराना ब्रह्मानंद का वातावरण
था। तभी आवाज आयी – यह चमड़े
का आवरण भी उतारो। अप्सरा ने
ऐसा ही किया (उसके पास और कोई
विकल्प भी न था)। स्त्रियों के पास
विकल्प जैसा कुछ
नहीं होता जबकि पूरा विश्व है पुरुष के
जीतने के लिए, पूरी वसुंधरा है उसे भोगने के
लिए। बस उसे कुछ बेड़ियां छोड़नी है और
थोड़ी वीरता दिखानी है।
हालांकि आजतक
नहीं जीता जा सका विश्व और न
ही भोगी गयी वसुंधरा। हर बार
जीती गयी स्त्री। हर बार उसे
ही भोगा गया।

No comments:

Post a Comment